प्रयागराज। शांति भंग की आशंका के नाम पर लोगों को उठाकर जेल भेजने की पुलिसिया प्रवृत्ति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा प्रहार किया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है और इसे प्रशासनिक सुविधा या मनमानी के आधार पर कुचला नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि केवल “शांति भंग की आशंका” का हवाला देकर किसी व्यक्ति को जेल भेजना कानून की मंशा नहीं है। यदि पुलिस या प्रशासन बिना पर्याप्त आधार के किसी नागरिक की स्वतंत्रता का हनन करता है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी और उन्हें हर्जाना अपनी जेब से भी भरना पड़ सकता है।
अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब प्रदेश के कई कमिश्नरेट और जिलों में धारा 170/126 बीएनएसएस (पूर्व की धारा 107/116 सीआरपीसी) के तहत बड़ी संख्या में लोगों को पाबंद या निरुद्ध किए जाने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। कई मामलों में आरोप लगे कि व्यक्तिगत रंजिश, राजनीतिक दबाव या स्थानीय प्रभाव के चलते लोगों को शांति भंग की आशंका बताकर कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य की जिम्मेदारी कानून व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों को ताक पर रख दिया जाए। लोकतंत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है और उसका संरक्षण न्यायपालिका का संवैधानिक दायित्व है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस कमिश्नर प्रयागराज को निर्देश दिया है कि आदेश का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करें तथा 14 सितंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करें।
यह फैसला केवल प्रयागराज ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी के लिए एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। कानूनी जानकारों का मानना है कि अब अधिकारियों को किसी भी व्यक्ति के खिलाफ शांति भंग की कार्रवाई करने से पहले ठोस आधार और पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे, अन्यथा उन्हें न्यायिक जवाबदेही का सामना करना पड़ सकता है।
वर्षों से यह शिकायत उठती रही है कि चुनाव, धरना-प्रदर्शन, भूमि विवाद और स्थानीय राजनीतिक संघर्षों के दौरान “शांति भंग की आशंका” प्रशासन का सबसे आसान हथियार बन जाती है। हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि कानून व्यवस्था के नाम पर नागरिक अधिकारों का दमन अब आसान नहीं होगा। यदि आदेश का सख्ती से पालन हुआ तो यह फैसला आम नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।


