यस. यस. उपाध्याय
सभ्यता के विकास के साथ दुनिया में अनेक धर्म, पंथ, संप्रदाय और विचारधाराएं जन्मीं। किसी ने ईश्वर को मंदिर में खोजा, किसी ने मस्जिद में, किसी ने गिरजाघर में तो किसी ने गुरुद्वारे में। पूजा-पद्धतियां बदलीं, भाषाएं बदलीं, परंपराएं बदलीं, लेकिन एक सत्य कभी नहीं बदला,मनुष्य का मूल धर्म मानवता है।
यदि इतिहास के पन्ने पलटें तो पाएंगे कि सभी महान धर्मों का मूल संदेश एक ही रहा है। भगवान श्रीराम ने मर्यादा का पाठ पढ़ाया, भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म का संदेश दिया, महात्मा बुद्ध ने करुणा का मार्ग दिखाया, भगवान महावीर ने अहिंसा को जीवन का आधार बनाया, गुरु नानक देव ने सेवा और समानता का उपदेश दिया, ईसा मसीह ने प्रेम और क्षमा को सर्वोच्च बताया और पैगंबर हजरत मोहम्मद ने इंसाफ तथा मानव कल्याण की शिक्षा दी। अलग-अलग कालखंडों में जन्मे इन महापुरुषों की वाणी का सार एक ही था—मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना।
वास्तव में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। धर्म का अर्थ है धारण करना। जो जीवन को सत्य, न्याय, करुणा और सदाचार के मार्ग पर चलाए वही धर्म है। यदि कोई व्यक्ति मंदिर जाता है लेकिन उसके व्यवहार में दया नहीं है, यदि कोई नमाज पढ़ता है लेकिन उसके भीतर इंसानियत नहीं है, यदि कोई धार्मिक ग्रंथों का पाठ करता है लेकिन उसके मन में घृणा है, तो वह धर्म के बाहरी स्वरूप का पालन कर रहा है, धर्म के सार का नहीं।
आज दुनिया का सबसे बड़ा संकट धर्म नहीं बल्कि धर्म की गलत व्याख्या है। जब धर्म राजनीति का हथियार बनता है, जब आस्था को नफरत का माध्यम बनाया जाता है, जब जाति और संप्रदाय के नाम पर समाज को बांटा जाता है, तब धर्म कमजोर नहीं होता, बल्कि मानवता घायल होती है। सच्चा धर्म कभी विभाजन नहीं करता, वह जोड़ता है। वह दीवारें नहीं खड़ी करता, पुल बनाता है।
भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र भी यही रहा है—”वसुधैव कुटुम्बकम्” अर्थात पूरी पृथ्वी एक परिवार है। हजारों वर्षों से भारत ने विभिन्न मतों और विचारों को अपने भीतर स्थान दिया है। यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन, सिख, मुस्लिम, ईसाई और अनेक परंपराएं साथ-साथ विकसित हुईं। यह केवल सहिष्णुता नहीं, बल्कि विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण है।
एक धर्म का अर्थ यह नहीं कि सभी लोग एक जैसी पूजा करें या एक ही पंथ को मानें। इसका अर्थ है कि सभी मनुष्य मानवता, सत्य, प्रेम और न्याय के सार्वभौमिक धर्म को स्वीकार करें। जब कोई भूखे को भोजन कराता है, किसी असहाय की मदद करता है, किसी पीड़ित के आंसू पोंछता है, तब वह सबसे बड़ी धार्मिक साधना कर रहा होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम धर्म के बाहरी प्रतीकों से आगे बढ़कर उसके वास्तविक स्वरूप को समझें। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर तक जाने वाले रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य मनुष्य को बेहतर इंसान बनाना है। यदि धर्म हमें विनम्र, सहिष्णु, न्यायप्रिय और करुणामय नहीं बनाता, तो हमें अपने धर्मबोध पर पुनर्विचार करना चाहिए।
मानव इतिहास ने यह सिद्ध किया है कि नफरत कभी स्थायी विजय नहीं दिला सकती। प्रेम, करुणा और भाईचारा ही वह शक्ति है जिसने सभ्यताओं को जीवित रखा है। इसलिए यदि दुनिया को शांति चाहिए, समाज को स्थिरता चाहिए और मानवता को भविष्य चाहिए, तो हमें एक धर्म को स्वीकार करना होगा,मानव धर्म।
यही वह धर्म है जिसमें कोई ऊंचा-नीचा नहीं, कोई जाति नहीं, कोई भेदभाव नहीं। यहां केवल मनुष्य है और मनुष्यता है। यही धर्म सभी धर्मों का सार है, यही ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग है और यही वह प्रकाश है जो मानव सभ्यता को अंधकार से बाहर निकाल सकता है।
लेखक गवर्नर हाउस उत्तर प्रदेश में विधि परामर्शदाता रहे हैं।


