– जीरो टॉलरेंस की राह में खड़ी हो रही अदृश्य दीवार
शरद कटियार
फर्रुखाबाद। जनपद के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ऐसे संगठित तंत्र की चर्चा तेज है, जिसे खुले तौर पर कोई नाम नहीं दे रहा, लेकिन जानकार इसे “सफेदपोश नेटवर्क” के रूप में देख रहे हैं। चर्चाओं का केंद्र यह है कि जिले में विकास, कानून व्यवस्था और शासन की प्राथमिकताओं के बीच कुछ ऐसे तत्व सक्रिय हैं, जो प्रत्यक्ष नहीं बल्कि परोक्ष रूप से निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार यह तंत्र किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। प्रभावशाली संपर्कों, सूचनाओं के चयनात्मक प्रसार और सत्ता के विभिन्न केंद्रों तक पहुंच के जरिए माहौल निर्माण की कोशिशें किए जाने की चर्चाएं हैं। प्रशासनिक हलकों में यह भी माना जा रहा है कि कई बार वास्तविक समस्याओं से अधिक कृत्रिम मुद्दों को प्रमुखता दिलाने का प्रयास होता है, जिससे शासन की प्राथमिकताओं और जमीनी आवश्यकताओं के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है।
जनपद में पिछले कुछ वर्षों के दौरान माफिया, अवैध कब्जों, खनन और सरकारी संपत्तियों से जुड़े मामलों में हुई कार्रवाइयों ने यह संकेत दिया है कि शासन की मंशा कठोर कार्रवाई की रही है। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि जब भी किसी व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ती है, तब कुछ हित समूह अपने प्रभाव को बचाने के लिए नए तरीके तलाशते हैं। ऐसे में भ्रम पैदा करना और निर्णयकर्ताओं तक आधी-अधूरी सूचनाएं पहुंचाना एक प्रभावी हथियार बन जाता है।
जानकारों का कहना है कि किसी भी जिले की प्रशासनिक सफलता केवल आदेशों से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि निर्णय लेने वालों तक पहुंचने वाली सूचनाएं कितनी निष्पक्ष और तथ्यपरक हैं। यदि सूचना तंत्र ही प्रभावित होने लगे तो शासन की मंशा और परिणामों के बीच दूरी बढ़ सकती है।
चर्चा यह भी है कि कुछ लोग स्वयं को जनहित, सामाजिक सरोकार या विकास की आवाज बताकर प्रभाव स्थापित करने के लगातार प्रयास कर हैं, जबकि उनके वास्तविक उद्देश्य कुछ और हैं। यही कारण है कि अनुभवी अधिकारी और जनप्रतिनिधि अब केवल सूचनाओं पर नहीं बल्कि उनके स्रोतों पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं।
जागरूक नागरिकों का मानना है कि मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति को सफल बनाने के लिए केवल अपराधियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन अदृश्य तंत्रों की पहचान भी जरूरी है जो व्यवस्था को भ्रमित करने की क्षमता रखते हैं। यदि समय रहते ऐसे प्रयासों को चिन्हित नहीं किया गया तो विकास योजनाओं, प्रशासनिक निर्णयों और जनहित के कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।


