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Sunday, June 7, 2026

दिखावे की बैठकों से नहीं बचेगी विरासत, धूल फांक रही हैं फर्रुखाबाद की धरोहरें

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फर्रुखाबाद की ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के नाम पर एक बार फिर बैठक हुई, प्रस्ताव पारित हुए, समितियां बनाने की घोषणा हुई और दो महीने में रिपोर्ट तैयार करने का दावा भी कर दिया गया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल बैठकों और प्रस्तावों से इतिहास बच जाएगा? पिछले कई वर्षों का अनुभव तो यही बताता है कि जिले की अधिकांश ऐतिहासिक धरोहरें आज भी उपेक्षा, अतिक्रमण और प्रशासनिक उदासीनता की शिकार हैं।

पांचाल क्षेत्र महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। श्रृंगीरामपुर, कंपिल, पांडेश्वरनाथ, गंगा तट के अनेक प्राचीन स्थल और सैकड़ों वर्ष पुराने मंदिर आज भी जिले की पहचान हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश स्थलों पर न तो समुचित संरक्षण है और न ही पर्यटन की मूलभूत सुविधाएं। कई स्थानों पर जाने के लिए सड़कें तक बदहाल हैं। पुरातात्विक महत्व के अनेक स्थल झाड़ियों और अव्यवस्था में दबे पड़े हैं।

विडंबना यह है कि हर कुछ वर्षों में इतिहास बचाने, पर्यटन बढ़ाने और धरोहरों के संरक्षण के नाम पर बैठकें होती हैं, लेकिन धरातल पर परिणाम दिखाई नहीं देते। यदि वास्तव में धरोहरों को बचाने की गंभीर इच्छा होती तो अब तक जिले के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण हो चुका होता, उनकी डिजिटल मैपिंग हो चुकी होती और उनके संरक्षण के लिए स्थायी बजट भी तय किया जा चुका होता।

गंगा तट पर थीम पार्क, पुस्तकालय और पर्यटन विकास की बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, लेकिन पहले उन धरोहरों को बचाना आवश्यक है जो आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। जिन स्थलों पर सूचना पट्ट तक नहीं हैं, जहां सुरक्षा व्यवस्था नहीं है और जहां अतिक्रमण लगातार बढ़ रहा है, वहां नई योजनाओं की घोषणाएं कहीं न कहीं दिखावटी प्रतीत होती हैं।

सवाल यह भी है कि पिछले दस वर्षों में शोध सहयोग देने वाली संस्थाओं की रिपोर्टों और सुझावों पर कितना अमल हुआ? यदि इतने वर्षों से शोध कार्य हो रहे हैं तो उनकी उपलब्धियां आम जनता के सामने क्यों नहीं हैं? कितने स्थलों का संरक्षण हुआ, कितने स्थानों का विकास हुआ और कितने नए तथ्य सामने आए, इसका सार्वजनिक लेखा-जोखा भी होना चाहिए।

फर्रुखाबाद की धरोहरें केवल ईंट-पत्थरों की संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि यह जिले की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति हैं। यदि इन्हें बचाने के लिए वास्तविक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई तो आने वाली पीढ़ियां केवल बैठकों की कार्यवाही पढ़ेंगी और धरोहरें इतिहास के पन्नों में सिमट जाएंगी।

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