डॉ. विजय गर्ग
आज विश्व भर में पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और हरित विकास की बातें हो रही हैं। हर वर्ष करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं, वृक्षारोपण अभियान चलाए जाते हैं, फोटो खिंचवाई जाती हैं और सोशल मीडिया पर संदेश साझा किए जाते हैं। लेकिन एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या लगाया गया हर पौधा वास्तव में पेड़ बन पाता है?
सच्चाई यह है कि अधिकांश पौधे पेड़ बनने से पहले ही नष्ट हो जाते हैं। कहीं उन्हें पानी नहीं मिलता, कहीं पशु खा जाते हैं, कहीं निर्माण कार्यों की भेंट चढ़ जाते हैं और कहीं मानव की लापरवाही उन्हें जीवित नहीं रहने देती। ऐसे में केवल पौधा लगाना पर्याप्त नहीं है। यदि उसकी देखभाल नहीं की गई, तो वह कभी पेड़ नहीं बन पाएगा।
एक पौधा और एक पेड़ के बीच वर्षों का अंतर होता है। पौधा लगाना एक दिन का कार्य है, लेकिन उसे पेड़ बनाना कई वर्षों की जिम्मेदारी है। जिस प्रकार एक बच्चे को जन्म देने के बाद उसके पालन-पोषण, शिक्षा और सुरक्षा की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार पौधे को भी निरंतर देखभाल चाहिए। यदि यह देखभाल नहीं मिलेगी, तो उसका भविष्य अंधकारमय होगा।
आज अनेक सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएँ वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित करती हैं। हजारों पौधे लगाए जाने के आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं, लेकिन यह बहुत कम देखा जाता है कि उनमें से कितने पौधे पाँच वर्ष बाद भी जीवित हैं। कई बार पौधारोपण केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। कार्यक्रम समाप्त होते ही पौधों की सुध लेने वाला कोई नहीं रहता। परिणामस्वरूप अधिकांश पौधे सूख जाते हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि वृक्षारोपण की सफलता केवल लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि जीवित बचे पौधों की संख्या से मापी जानी चाहिए। यदि सौ पौधे लगाए जाएँ और उनमें से केवल दस जीवित रहें, तो यह सफलता नहीं कही जा सकती। इसके विपरीत यदि दस पौधे लगाए जाएँ और सभी स्वस्थ वृक्ष बन जाएँ, तो वह वास्तविक उपलब्धि होगी।
पौधे के पेड़ बनने में कई चुनौतियाँ आती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी, वर्षा के बदलते पैटर्न और जल संकट ने पौधों के अस्तित्व को और कठिन बना दिया है। गर्मियों के महीनों में यदि नियमित सिंचाई न हो, तो अधिकांश पौधे सूख जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं से सुरक्षा की आवश्यकता होती है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यातायात, प्रदूषण और निर्माण कार्य उनके लिए खतरा बन जाते हैं।
स्कूलों और कॉलेजों में भी बड़े उत्साह से पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं। यह एक सकारात्मक पहल है, लेकिन छात्रों को केवल पौधा लगाने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्हें पौधों की नियमित देखभाल, सिंचाई और संरक्षण की जिम्मेदारी भी दी जानी चाहिए। जब विद्यार्थी किसी पौधे को अपने मित्र की तरह अपनाते हैं, तब उसके जीवित रहने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
परिवारों को भी इस दिशा में अपनी भूमिका समझनी होगी। यदि प्रत्येक परिवार अपने घर, खेत, आंगन या आसपास लगाए गए पौधों की देखभाल का संकल्प ले, तो पर्यावरण संरक्षण का अभियान अधिक प्रभावी हो सकता है। वृक्ष केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि छाया, फल, औषधियाँ और जैव विविधता का आधार भी प्रदान करते हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ पर्यावरण सुनिश्चित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
आज आवश्यकता केवल वृक्षारोपण की नहीं, बल्कि वृक्ष संरक्षण की है। हमें यह समझना होगा कि पौधा लगाना शुरुआत है, मंजिल नहीं। मंजिल तब पूरी होती है जब वही छोटा पौधा वर्षों बाद विशाल वृक्ष बनकर समाज और प्रकृति को लाभ पहुँचाता है।
यदि हम केवल पौधे लगाते रहेंगे और उनकी देखभाल नहीं करेंगे, तो पर्यावरण संरक्षण का सपना अधूरा रह जाएगा। एक सूखा हुआ पौधा हमें याद दिलाता है कि केवल उत्साह पर्याप्त नहीं, जिम्मेदारी भी आवश्यक है। इसलिए अगली बार जब हम कोई पौधा लगाएँ, तो यह संकल्प भी लें कि उसे पेड़ बनने तक सुरक्षित रखेंगे।
क्योंकि सच यही है—देखभाल के बिना लगाया गया पौधा, पेड़ नहीं बन पाएगा।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


