42.2 C
Lucknow
Thursday, June 4, 2026

कन्नौज की वह रात: जब शंकराचार्य टेंट में और संत फुटपाथ पर थे

Must read

शरद कटियार
कन्नौज। यह केवल एक तस्वीर नहीं है। यह एक सवाल है। एक ऐसा सवाल, जो हर उस व्यक्ति के मन में उठना चाहिए जो सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और संत परंपरा के सम्मान की बात करता है।

कन्नौज में ज्योतिषपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के प्रवास की जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों को झकझोर कर रख दिया। तस्वीरों में देश के सर्वोच्च धर्माचार्यों में शामिल एक शंकराचार्य सड़क किनारे टेंट में विश्राम करते दिखाई दिए, जबकि उनके साथ चल रहे संत-महात्मा फुटपाथ पर रात गुजारने को मजबूर नजर आए।

यह दृश्य केवल प्रशासनिक अव्यवस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि उस संवेदनहीनता का आईना है जो धीरे-धीरे हमारी व्यवस्था में घर करती जा रही है।
जिस भारत में शंकराचार्य पद को अद्वितीय सम्मान प्राप्त है, जहां हजारों वर्षों से यह परंपरा सनातन धर्म का मार्गदर्शन करती आई है, वहां एक शंकराचार्य के प्रवास के दौरान सम्मानजनक व्यवस्था तक न होना कई प्रश्न खड़े करता है।
विडंबना यह है कि राजनीतिक नेताओं, मंत्रियों और वीआईपी मेहमानों के लिए सरकारी मशीनरी रातों-रात भव्य इंतजाम कर देती है। सड़कें सज जाती हैं, गेस्ट हाउस आरक्षित हो जाते हैं, सुरक्षा के विशेष प्रबंध किए जाते हैं। लेकिन जब बात एक शंकराचार्य और उनके साथ चल रहे संतों की आती है तो तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां करती दिखाई देती हैं।
क्या यह वही भारत है, जो विश्व गुरु बनने का सपना देख रहा है?
क्या यह वही देश है, जहां संतों को समाज का नैतिक पथप्रदर्शक माना जाता है?
क्या यह वही सनातन भूमि है, जहां साधु-संतों के चरणों में राजाओं ने भी सिर झुकाया था?
सबसे दुखद पहलू यह है कि यह मामला किसी व्यक्ति विशेष का नहीं है। शंकराचार्य स्वयं सादगी और त्याग के प्रतीक हैं। उन्हें आलीशान भवनों की आवश्यकता नहीं। लेकिन प्रश्न उनके व्यक्तिगत आराम का नहीं, बल्कि उस सम्मान का है जो समाज और प्रशासन को उनकी गरिमा के अनुरूप देना चाहिए।
यदि देश के एक शंकराचार्य सड़क किनारे टेंट में रात बिताने को विवश दिखाई दें और उनके साथ के संत फुटपाथ पर सोएं, तो यह केवल एक आयोजन की विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना की परीक्षा भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति से ऊपर उठकर इस घटना पर आत्ममंथन किया जाए। यदि तस्वीरें सच हैं तो जिम्मेदार लोगों को जवाब देना चाहिए कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े धर्माचार्य के सम्मान में कमी क्यों रह गई।
क्योंकि यह केवल कन्नौज की एक रात की कहानी नहीं है। यह उस प्रश्न की कहानी है जो हर सनातनी के मन में उठ रहा है,
क्या संतों का सम्मान अब केवल भाषणों, नारों और मंचों तक सीमित रह गया है?
और यदि इस प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ है, तो यह किसी एक शंकराचार्य का नहीं, पूरे सनातन समाज का अपमान है।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article