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Sunday, May 31, 2026

रोज पेपर लीक होना कहीं प्रतिभाओं की हत्या या भ्रष्टाचारियों की फसल उगाने की सुनियोजित खेती तो नहीं?

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शरद कटियार

देश में आजकल दो चीजें सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं एक युवाओं का भविष्य और दूसरा भर्ती परीक्षाओं का प्रश्नपत्र। फर्क सिर्फ इतना है कि प्रश्नपत्र लीक होने की खबर अखबारों में छप जाती है, लेकिन लाखों युवाओं के टूटे सपनों की चीख किसी सरकारी फाइल में दर्ज नहीं होती।
हर बार वही कहानी, वही बयान और वही घिसे-पिटे तर्क। पेपर लीक हो गया, जांच बैठा दी गई, कुछ गिरफ्तारियां हो गईं, कुछ अधिकारियों का तबादला हो गया, कुछ नेताओं ने कड़ी कार्रवाई की बात कह दी और फिर अगले पेपर लीक की तैयारी शुरू हो गई। ऐसा लगता है जैसे देश में भर्ती परीक्षाएं नहीं, बल्कि पेपर लीक का वार्षिक महोत्सव आयोजित किया जा रहा हो।
सवाल यह है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है?
क्या वास्तव में व्यवस्था इतनी कमजोर है कि हर कुछ महीनों में कोई न कोई प्रश्नपत्र बाहर आ जाता है? या फिर व्यवस्था कमजोर नहीं, बल्कि कुछ लोगों के लिए जानबूझकर कमजोर रखी गई है?
जब कोई बैंक लाखों करोड़ रुपये सुरक्षित रख सकता है, जब मिसाइलों के गुप्त कोड सुरक्षित रखे जा सकते हैं, जब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रह सकते हैं, तब कुछ पन्नों के प्रश्नपत्र बार-बार बाहर कैसे आ जाते हैं?
यदि दस साल पहले किसी ने कहा होता कि भर्ती परीक्षाओं से पहले प्रश्नपत्र बिकेंगे, अभ्यर्थियों के लिए दरें तय होंगी, गिरोह बनेंगे और करोड़ों का कारोबार होगा, तो शायद लोग विश्वास नहीं करते। लेकिन आज यह एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है।
देश में पेपर लीक अब अपराध कम और उद्योग अधिक दिखाई देता है।
एक ऐसा उद्योग जिसमें कुछ लोग युवाओं की मेहनत खरीदते हैं, कुछ लोग व्यवस्था बेचते हैं और कुछ लोग आंखें बंद करके सब कुछ देखते रहते हैं।
सबसे दुखद बात यह है कि हर पेपर लीक के बाद सबसे ज्यादा सजा उसी को मिलती है जो सबसे कम दोषी होता है,अभ्यर्थी।
जिस छात्र ने दो साल तैयारी की, जिसने परिवार की आर्थिक परेशानियों के बीच किताबें खरीदीं, जिसने मोबाइल छोड़कर लाइब्रेरी में दिन-रात बिताए, जिसने दोस्तों की शादियां छोड़ीं, त्योहार छोड़े, नींद छोड़ी,सजा उसे मिलती है।
पेपर लीक होता है।परीक्षा रद्द होती है।भर्ती टलती है।उम्र सीमा आगे बढ़ती है।अवसाद बढ़ता है।
और फिर सरकारें युवाओं से धैर्य रखने की अपील करती हैं।
अजीब विडंबना है। चोरी कोई और करे, सजा कोई और भुगते।
अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि परीक्षा केंद्र पर पहुंचने से पहले अभ्यर्थी यह नहीं सोचता कि पेपर कैसा आएगा, बल्कि यह सोचता है कि कहीं यह परीक्षा भी रद्द न हो जाए।
यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
दरअसल पेपर लीक केवल प्रश्नपत्र की चोरी नहीं है। यह समान अवसर की अवधारणा पर हमला है। यह संविधान की उस भावना पर हमला है जो योग्यता के आधार पर अवसर देने की बात करती है। यह उन गरीब परिवारों के खिलाफ अपराध है जिनके पास रिश्वत देने के लिए पैसा नहीं होता लेकिन मेहनत करने का साहस होता है।
विडंबना देखिए।देश में भ्रष्टाचार विरोधी भाषणों की कमी नहीं है।
जीरो टॉलरेंस के दावे भी खूब सुनाई देते हैं।
लेकिन पेपर लीक माफिया हर बार किसी न किसी कोने से निकल आता है।
क्यों?क्योंकि भ्रष्टाचार केवल पैसे का लेन-देन नहीं होता। भ्रष्टाचार वह मानसिकता भी है जिसमें कुछ लोग यह मान लेते हैं कि व्यवस्था उनकी निजी जागीर है और जनता सिर्फ तमाशबीन।
आज जरूरत इस बात की नहीं कि छोटे-मोटे दलालों की तस्वीरें मीडिया में दिखाकर उपलब्धि का ढोल पीटा जाए। जरूरत इस बात की है कि यह पता लगाया जाए कि आखिर वे बड़े चेहरे कौन हैं जिनके संरक्षण में यह खेल वर्षों से फल-फूल रहा है।
क्यों हर बड़े पेपर लीक में छोटे खिलाड़ी पकड़ लिए जाते हैं लेकिन व्यवस्था के बड़े मगरमच्छ शायद ही कभी कानून के शिकंजे में दिखाई देते हैं?
क्यों हर बार जांच लंबी होती जाती है और युवाओं की उम्मीदें छोटी होती जाती हैं?
क्यों हर बार दोषियों से ज्यादा चर्चा अगली परीक्षा की तारीख पर होती है?
इन सवालों के जवाब देश का युवा मांग रहा है।
और उसे जवाब मिलना भी चाहिए।
क्योंकि यह सिर्फ नौकरी का प्रश्न नहीं है।
यह उस भरोसे का प्रश्न है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है।
यदि प्रतिभा की जगह पहुंच, मेहनत की जगह पैसे और योग्यता की जगह सिफारिश जीतने लगे तो समाज में निराशा पैदा होती है। फिर युवाओं के मन में यह भावना घर करने लगती है कि ईमानदारी मूर्खता है और व्यवस्था केवल प्रभावशाली लोगों के लिए बनी है।
यह भावना किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
सरकारें बदल सकती हैं।
अधिकारी बदल सकते हैं।
भर्ती बोर्ड बदल सकते हैं।
लेकिन यदि व्यवस्था की नीयत नहीं बदली तो पेपर लीक की खबरें भी नहीं बदलेंगी।
आज देश का युवा पूछ रहा है,
क्या प्रश्नपत्र लीक हो रहे हैं या फिर व्यवस्था का चरित्र?
क्या चोरी केवल पेपर की हो रही है या फिर करोड़ों युवाओं के भविष्य की?
और सबसे बड़ा प्रश्न,क्या पेपर लीक एक दुर्घटना है या फिर प्रतिभाओं को कुचलकर भ्रष्टाचारियों की फसल उगाने की सुनियोजित खेती?
जब तक इन प्रश्नों का ईमानदार उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक हर नया पेपर लीक सिर्फ एक खबर नहीं होगा, बल्कि व्यवस्था के माथे पर लगा एक और कलंक होगा।

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