डॉ विजय गर्ग
धरती के भीतर रहने वाले केंचुए—जिन्हें हम सामान्यतः मामूली जीव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं—वास्तव में पृथ्वी की उर्वरता के सबसे बड़े रक्षक हैं। ये मिट्टी को हवा देते हैं, पानी को जमीन में पहुंचाने में मदद करते हैं, जैविक पदार्थों को खाद में बदलते हैं और फसलों की उत्पादकता बढ़ाते हैं। वैज्ञानिक इन्हें “इकोसिस्टम इंजीनियर” कहते हैं, क्योंकि ये मिट्टी के पूरे जीवन-तंत्र को सक्रिय बनाए रखते हैं।
लेकिन आज यही मौन जीव एक गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। यह संकट दिखाई नहीं देता, न ही इसके बारे में बड़े आंदोलन होते हैं। यह संकट हमारे पैरों के नीचे, मिट्टी के भीतर, धीरे-धीरे फैल रहा है।
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहाँ केंचुओं की जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार भारत में लगभग 450 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
फिर भी रासायनिक खेती, अत्यधिक जुताई, कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग, मिट्टी की घटती जैविक गुणवत्ता और जलवायु परिवर्तन ने इनकी संख्या को तेजी से प्रभावित किया है।
हरित क्रांति ने पंजाब, हरियाणा और गंगा के मैदानों में अनाज उत्पादन बढ़ाया, लेकिन इसके साथ मिट्टी की प्राकृतिक शक्ति कमजोर होती चली गई। लगातार गेहूँ-धान चक्र, यूरिया और रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग, तथा पराली जलाने जैसी प्रथाओं ने मिट्टी के जैविक कार्बन और सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुँचाया है।
अध्ययन बताते हैं कि गहन कृषि वाले क्षेत्रों में अर्थवर्म बायोमास में 50% से 100% तक गिरावट दर्ज की गई है।
यह केवल एक छोटे जीव का गायब होना नहीं है; यह मिट्टी के जीवित होने की क्षमता का कमजोर पड़ना है।
कीटनाशकों का असर भी बेहद गंभीर है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि मिट्टी में जमा pesticide residue केंचुओं की आबादी को लगातार कम कर रहे हैं।
जहाँ पहले बारिश के बाद खेतों में बड़ी संख्या में केंचुए दिखाई देते थे, अब कई किसानों को वे लगभग गायब लगते हैं। उत्तराखंड के कुछ क्षेत्रों में किसानों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में खेतों में काले रंग के केंचुओं की संख्या तेजी से घटी है।
जलवायु परिवर्तन ने संकट को और गहरा बना दिया है। बढ़ता तापमान, सूखा, अचानक बाढ़ और मिट्टी की नमी में कमी केंचुओं के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ पैदा कर रही हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी के भीतर हो रही यह गिरावट भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।
अर्थवर्म केवल मिट्टी को उपजाऊ नहीं बनाते, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देते हैं। पक्षियों, सूक्ष्म जीवों और पौधों का जीवन उनसे जुड़ा होता है। जहाँ केंचुए कम होते हैं, वहाँ मिट्टी कठोर होने लगती है, पानी कम सोखती है और फसलों को अधिक रासायनिक खाद की आवश्यकता पड़ती है।
दुनिया के कई देशों में वैज्ञानिक “इंसैक्टागेडन” यानी कीटों की भारी गिरावट की चर्चा कर रहे हैं। अब विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि “अर्थवर्म संकट” भी उतना ही गंभीर हो सकता है।
हालाँकि उम्मीद अभी बाकी है।
जैविक खेती, वर्मी-कम्पोस्ट, फसल चक्र, कम जुताई (minimum tillage), मिट्टी में जैविक पदार्थ लौटाना और रासायनिक कीटनाशकों के सीमित उपयोग से केंचुओं की आबादी को फिर से बढ़ाया जा सकता है। मिट्टी को केवल “धूल” नहीं, बल्कि जीवित प्रणाली मानने की आवश्यकता है।
हमें यह समझना होगा कि यदि मिट्टी के भीतर का जीवन समाप्त होने लगा, तो खेतों की हरियाली भी अधिक समय तक नहीं टिक पाएगी।
धरती के कीड़े हमें एक मौन चेतावनी दे रहे हैं—प्रकृति का संतुलन टूट रहा है। प्रश्न यह है कि क्या हम समय रहते इस चेतावनी को सुन पाएंगे?
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


