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Tuesday, May 26, 2026

यूपी में पिछड़ा वर्ग फ्रंट का आगाज, नए सामाजिक समीकरणों की आहट

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– पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह यादव संभालेंगे नेतृत्व
– युवा नेता प्रभाकर राजपूत और पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष रुपेश गुप्ता ने बताया समय की जरूरत
शरद कटियार
लखनऊ/फर्रुखाबाद। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए सामाजिक और राजनीतिक मंच की आहट सुनाई देने लगी है। “पिछड़ा वर्ग फ्रंट” के गठन को लेकर प्रदेशभर में चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस पहल का नेतृत्व पूर्व मंत्री नरेन्द्र सिंह यादव के हाथों में जाने की खबरों ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि यह मंच आने वाले समय में पिछड़े वर्ग की राजनीतिक हिस्सेदारी, सामाजिक सम्मान और आर्थिक अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा दे सकता है।

युवा बीजेपी नेता प्रभाकर राजपूत ने इस पहल को “समय की मांग” बताते हुए कहा कि प्रदेश का पिछड़ा समाज अब केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं रहना चाहता, बल्कि सत्ता और नीति निर्माण में बराबर की भागीदारी चाहता है। वहीं भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखते रुपेश गुप्ता ने भी इस प्रयास को सकारात्मक बताते हुए कहा कि लोकतंत्र में हर समाज को संगठित होकर अपनी आवाज उठाने का अधिकार है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ा सामाजिक और चुनावी आधार माना जाता है। प्रदेश की कुल आबादी में ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यूपी की 403 विधानसभा सीटों में करीब 250 से अधिक सीटें ऐसी हैं जहां पिछड़ा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है। लोकसभा की 80 सीटों में भी आधे से अधिक क्षेत्रों में ओबीसी वोट जीत-हार तय करता है।

प्रदेश में यादव, कुर्मी, मौर्य, शाक्य, सैनी, निषाद, कश्यप, लोध, राजभर, पाल, प्रजापति और अन्य दर्जनों पिछड़ी जातियों का बड़ा सामाजिक आधार है। लेकिन लंबे समय से गैर-प्रमुख पिछड़ी जातियों में राजनीतिक उपेक्षा की भावना बनी हुई है। यही कारण है कि अब अलग मंच की मांग लगातार तेज होती जा रही है।

राजनीतिक आंकड़ों पर नजर डालें तो 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी संख्या में गैर-यादव पिछड़े वर्ग को साधकर सत्ता में वापसी की थी, जबकि समाजवादी पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक समीकरण के जरिए सामाजिक गठजोड़ मजबूत करने की कोशिश की। इसके बावजूद छोटे पिछड़े वर्गों के बीच अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान की चाह लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है।
सूत्रों के मुताबिक प्रस्तावित पिछड़ा वर्ग फ्रंट का फोकस केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। संगठन शिक्षा, युवाओं को रोजगार, स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा, सामाजिक न्याय, आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन और पंचायत से विधानसभा तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने जैसे मुद्दों पर भी काम करेगा। प्रदेश स्तर से लेकर जिला और ब्लॉक स्तर तक संगठन खड़ा करने की रणनीति तैयार की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह फ्रंट विभिन्न पिछड़ी जातियों को एक मंच पर लाने में सफल होता है तो आने वाले पंचायत, निकाय और विधानसभा चुनावों में इसका बड़ा असर दिखाई दे सकता है। फिलहाल यह पहल सामाजिक आंदोलन के रूप में शुरू होती दिख रही है, लेकिन इसकी राजनीतिक संभावनाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा रहा।

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