क्या सरकारें सचमुच जनता को राहत देना चाहती हैं या ईंधन बना हुआ है सबसे बड़ा राजस्व हथियार?
शरद कटियार
भारत में पेट्रोल और डीजल अब केवल ईंधन नहीं रहे, बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था और सरकारी खजाने की सबसे बड़ी धुरी बन चुके हैं। जब भी पेट्रोल पंप पर कीमतें बढ़ती हैं, जनता की नाराजगी सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक दिखाई देती है। लेकिन हर बार सवाल वहीं आकर रुक जाता है आखिर पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में क्यों नहीं लाया जाता?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में आम आदमी जिस कीमत पर पेट्रोल खरीद रहा है, उसमें तेल की असली कीमत से ज्यादा हिस्सा टैक्स का होता है। यानी जनता केवल ईंधन नहीं खरीद रही, बल्कि सरकारों के राजस्व मॉडल को भी अपने पैसे से चला रही है।
आज भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार से कम और सरकारों की टैक्स नीति से ज्यादा तय होती हैं। कच्चे तेल की कीमतें कई बार वैश्विक बाजार में गिरती हैं, लेकिन भारत में उसका लाभ जनता तक पूरी तरह नहीं पहुंचता। वजह साफ है केंद्र और राज्य दोनों सरकारें पेट्रोलियम उत्पादों को “कमाई के सबसे सुरक्षित स्रोत” के रूप में देखती हैं।
पेट्रोल-डीजल पर केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लगाती है, जबकि राज्य सरकारें वैट और सेस वसूलती हैं। कई राज्यों में तो स्थिति यह है कि एक लीटर पेट्रोल की बेस कीमत से ज्यादा पैसा टैक्स के रूप में वसूला जाता है। यही कारण है कि 45 से 50 रुपये की वास्तविक लागत वाला पेट्रोल टैक्स जुड़ते-जुड़ते 100 रुपये के पार पहुंच जाता है।
यानी सरकारें सड़क, विकास और योजनाओं के नाम पर जनता की जेब से लगातार बड़ी रकम निकाल रही हैं। यही वजह है कि पेट्रोल-डीजल अब “राजस्व मशीन” बन चुके हैं।
यदि वास्तव में पेट्रोल और डीजल को 28 प्रतिशत जीएसटी स्लैब में लाया जाए तो कीमतों में बड़ी गिरावट संभव है। कई आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि पेट्रोल 70 से 75 रुपये और डीजल 65 से 70 रुपये प्रति लीटर तक आ सकता है। यानी आम आदमी को सीधे 20 से 30 रुपये प्रति लीटर तक राहत मिल सकती है।
केंद्र सरकार चाहती है कि राज्यों का टैक्स ढांचा नियंत्रित हो, जबकि राज्य सरकारें अपनी आय कम नहीं करना चाहतीं। पेट्रोल-डीजल पर मिलने वाला वैट कई राज्यों की आर्थिक रीढ़ माना जाता है। यदि यह आय कम हो गई तो राज्यों के सामने वित्तीय संकट खड़ा हो सकता है।
यानी जनता की राहत और सरकारों की कमाई आमने-सामने खड़ी दिखाई देती है।
दरअसल भारत में टैक्स व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ अप्रत्यक्ष करों के रूप में आम जनता पर डाला जाता है। गरीब और अमीर दोनों एक ही दर पर पेट्रोल खरीदते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अमीर पर इसका असर कम पड़ता है और मध्यम वर्ग तथा गरीब परिवारों की पूरी मासिक व्यवस्था हिल जाती है।
महंगा ईंधन केवल वाहन चलाने वालों की समस्या नहीं है। इसका असर हर चीज पर पड़ता है। ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, फल-सब्जियां महंगी होती हैं, निर्माण सामग्री महंगी होती है और अंततः महंगाई पूरे बाजार को जकड़ लेती है। यानी पेट्रोल-डीजल की कीमतें देश की अर्थव्यवस्था की नसों में बहने वाले दबाव की तरह काम करती हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि विपक्ष जब सत्ता में होता है तो पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाने की बात करता है, लेकिन सत्ता में आते ही वही दल टैक्स कम करने से बचने लगता है। क्योंकि सत्ता में बैठते ही सरकारों को समझ आ जाता है कि पेट्रोलियम टैक्स सरकारी खजाने का सबसे आसान और स्थायी स्रोत है।
यही कारण है कि जीएसटी काउंसिल की बैठकों में वर्षों से यह मुद्दा उठता जरूर है, लेकिन किसी निर्णायक नतीजे तक नहीं पहुंचता। राज्यों को डर है कि उनका राजस्व घट जाएगा और केंद्र को चिंता है कि विकास योजनाओं के लिए पैसा कहां से आएगा।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इसका बोझ हमेशा जनता ही क्यों उठाए?
देश में जब चुनाव आते हैं तो सरकारें मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, सड़क और विकास की बातें करती हैं, लेकिन उसी जनता से पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स लेकर राजस्व भी वसूलती हैं। यानी राहत भी जनता के नाम पर और वसूली भी जनता से।
आज जरूरत इस बात की है कि पेट्रोलियम टैक्स नीति पर ईमानदार राष्ट्रीय बहस हो। सरकारों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जनता से वसूला जा रहा टैक्स आखिर कितना जरूरी है और उसकी वास्तविक उपयोगिता क्या है।
क्योंकि सच यही है कि भारत में पेट्रोल-डीजल केवल ईंधन नहीं, बल्कि राजनीति की सबसे महंगी आग बन चुके हैं जिसकी तपिश हर घर महसूस कर रहा है।


