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Monday, May 18, 2026

कूड़े के ढेर, खड़े शहर और पॉलिथीन का संकट

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डॉ विजय गर्ग
आज भारत सहित दुनिया के अनेक शहर एक ऐसी समस्या से जूझ रहे हैं, जो धीरे-धीरे केवल सफाई का नहीं बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और भविष्य का संकट बनती जा रही है। सड़कों के किनारे लगे कूड़े के ढेर, नालियों में फंसी प्लास्टिक, बरसात में जलभराव और हर जगह उड़ती पॉलिथीन की थैलियां अब आम दृश्य बन चुके हैं। आधुनिक जीवन की सुविधा ने शहरों को चमकदार तो बनाया, लेकिन उसी के साथ कचरे का पहाड़ भी खड़ा कर दिया।

इन कूड़े के ढेरों में सबसे बड़ी भूमिका पॉलिथीन और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक की है। कभी खरीदारी की सुविधा के लिए इस्तेमाल होने वाली यह हल्की थैली अब पर्यावरण की सबसे भारी समस्याओं में बदल चुकी है। यह न केवल शहरों को गंदा कर रही है बल्कि मिट्टी, पानी, हवा और जीव-जंतुओं तक को प्रभावित कर रही है
शहर बढ़े, कचरा भी बढ़ा

पिछले कुछ दशकों में तेजी से शहरीकरण हुआ। गांवों से लोग रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में शहरों की ओर आए। बड़ी आबादी के साथ उपभोग भी बढ़ा।

हर दिन: पैकेज्ड सामान, ऑनलाइन डिलीवरी, प्लास्टिक की बोतलें, फास्ट फूड के डिब्बे, और पॉलिथीन बैग
कचरे का हिस्सा बनते चले गए। आज बड़े शहरों में प्रतिदिन हजारों टन कचरा निकलता है। लेकिन समस्या केवल कचरे की मात्रा नहीं है, बल्कि उसका सही प्रबंधन न होना है। अधिकांश शहरों में कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की आदत अभी भी विकसित नहीं हो पाई है। परिणामस्वरूप जैविक कचरा, प्लास्टिक, कांच और मेडिकल वेस्ट सब एक साथ डंपिंग ग्राउंड में पहुंच जाते हैं।
पॉलिथीन: सुविधा से संकट तक

पॉलिथीन का इस्तेमाल इसलिए तेजी से बढ़ा क्योंकि यह:

सस्ती है, हल्की है, पानी से खराब नहीं होती, और आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
लेकिन यही गुण इसे पर्यावरण के लिए खतरनाक बनाते हैं। पॉलिथीन जल्दी गलती-सड़ती नहीं। इसे पूरी तरह खत्म होने में सैकड़ों साल लग सकते हैं।
लोग बाजार से सामान लेकर आते हैं और थैलियां कुछ ही मिनटों में कूड़े में फेंक दी जाती हैं। यही पॉलिथीन:
नालियों में फंसती है, जलभराव पैदा करती है, जानवरों के पेट में चली जाती है, और मिट्टी की उर्वरता को कम करती है।
बरसात के मौसम में अक्सर शहरों में जलभराव का एक बड़ा कारण प्लास्टिक और पॉलिथीन से बंद हुई नालियां होती हैं।
कूड़े के पहाड़ बनते शहर
दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे बड़े शहरों में कचरे के पहाड़ अब वास्तविकता बन चुके हैं। डंपिंग ग्राउंड इतने बड़े हो चुके हैं कि वे छोटी पहाड़ियों जैसे दिखाई देते हैं।
इन कूड़े के पहाड़ों से: जहरीली गैसें निकलती हैं, आग लगने का खतरा बना रहता है, भूजल प्रदूषित होता है, और आसपास रहने वाले लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है।
कई बार इन डंपिंग ग्राउंड में आग लग जाती है, जिससे जहरीला धुआं हवा में फैलता है। इससे सांस संबंधी बीमारियां बढ़ती हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है।
जानवरों और पक्षियों पर असर

सड़कों पर घूमने वाली गायें अक्सर कूड़े में फेंकी गई पॉलिथीन खा लेती हैं। कई पशु चिकित्सकों ने बताया है कि गायों के पेट से कई-कई किलो प्लास्टिक निकाला गया है। यह धीरे-धीरे उनके स्वास्थ्य को खराब करता है और कई बार उनकी मौत का कारण भी बन जाता है।

समुद्र और नदियों में पहुंचने वाला प्लास्टिक जलीय जीवों के लिए भी खतरनाक है। मछलियां, कछुए और पक्षी प्लास्टिक को भोजन समझकर निगल लेते हैं। इससे उनका जीवन चक्र प्रभावित होता है।
माइक्रोप्लास्टिक: अदृश्य खतरा

आज वैज्ञानिक एक और बड़े खतरे की चेतावनी दे रहे हैं — माइक्रोप्लास्टिक। जब प्लास्टिक छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटता है, तो वह मिट्टी, पानी और हवा में मिल जाता है।
ये सूक्ष्म प्लास्टिक कण: पीने के पानी में, समुद्री भोजन में, और यहां तक कि मानव शरीर में भी पाए जा रहे हैं।
यह भविष्य के लिए गंभीर स्वास्थ्य संकट बन सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक हार्मोन, पाचन तंत्र और अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है।

केवल सरकार जिम्मेदार नहीं

अक्सर लोग सारा दोष नगर निगम या सरकार पर डाल देते हैं, लेकिन यह समस्या केवल प्रशासन की नहीं है। नागरिकों की आदतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं।

हम अक्सर: सड़क पर कचरा फेंक देते हैं, पॉलिथीन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, और कचरे को अलग-अलग नहीं रखते। जब तक समाज स्वयं जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक कोई भी सफाई अभियान पूरी तरह सफल नहीं हो सकता।

प्रतिबंध क्यों असरदार नहीं हो पाते?

भारत के कई राज्यों में पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन जमीन पर इसका प्रभाव सीमित दिखाई देता है। इसके कई कारण हैं: सस्ती पॉलिथीन का आसानी से उपलब्ध होना, नियमों का कमजोर पालन, विकल्पों की कमी, और लोगों की पुरानी आदतें।

कई दुकानदार अभी भी चोरी-छिपे पॉलिथीन का उपयोग करते हैं क्योंकि कपड़े या कागज के बैग अपेक्षाकृत महंगे पड़ते हैं।
समाधान क्या हो सकते हैं?

कचरे का पृथक्करण

घर से ही गीले और सूखे कचरे को अलग करना जरूरी है। इससे रीसाइक्लिंग आसान होती है।

कपड़े और जूट के बैग

यदि लोग पॉलिथीन की जगह कपड़े या जूट के बैग इस्तेमाल करें, तो प्लास्टिक का उपयोग काफी कम हो सकता है।

रीसाइक्लिंग को बढ़ावा

प्लास्टिक कचरे को दोबारा उपयोग में लाने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

जागरूकता अभियान

स्कूलों, कॉलेजों और समाज में पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देना जरूरी है।

सख्त कानून

सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण और नियमों का कड़ाई से पालन आवश्यक है।
नागरिक भागीदारी

हर नागरिक को यह समझना होगा कि शहर केवल सरकार का नहीं, बल्कि सभी का है।
स्वच्छता और विकास का संबंध

एक स्वच्छ शहर केवल सुंदर ही नहीं दिखता, बल्कि वह स्वस्थ और आर्थिक रूप से भी मजबूत होता है। गंदगी और कचरे से: बीमारियां बढ़ती हैं, पर्यटन प्रभावित होता है, और जीवन की गुणवत्ता घटती है।
यदि शहर कूड़े के ढेरों में बदल जाएंगे, तो विकास की चमक भी फीकी पड़ जाएगी।
नई पीढ़ी की भूमिका

बच्चों और युवाओं में पर्यावरण के प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। कई युवा:
प्लास्टिक मुक्त अभियान चला रहे हैं, सफाई अभियान में भाग ले रहे हैं, और लोगों को जागरूक कर रहे हैं।

यदि नई पीढ़ी अपनी आदतों में बदलाव लाती है, तो आने वाले वर्षों में बड़ा परिवर्तन संभव है।
निष्कर्ष
कूड़े के ढेर और पॉलिथीन का संकट केवल सफाई का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की जीवनशैली का आईना है। हमने सुविधा को प्राथमिकता दी, लेकिन उसके परिणामों को नजरअंदाज कर दिया।
अब समय आ गया है कि: हम अपनी आदतें बदलें, प्लास्टिक पर निर्भरता कम करें, और शहरों को रहने योग्य बनाने की जिम्मेदारी समझें।
यदि आज हमने कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियों को साफ हवा, स्वच्छ पानी और स्वस्थ पर्यावरण देना मुश्किल हो जाएगा।
एक स्वच्छ शहर केवल सरकार की योजना से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों की सोच और जिम्मेदारी से बनता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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