इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी डॉक्टरों द्वारा निजी प्रैक्टिस करने के मामलों पर सख्त नाराजगी जताई है और इस पर तत्काल कार्रवाई के आदेश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि सरकारी सेवा में रहते हुए निजी क्लीनिक या अस्पताल चलाना नियमों का उल्लंघन है और इससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ता है। इसी के साथ मुख्य सचिव को ऐसे डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। इस आदेश के बाद पूरे राज्य में सरकारी डॉक्टरों की गतिविधियों पर नजर और तेज कर दी गई है।
हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद प्रशासन ने इस मामले में सख्ती बढ़ा दी है। आगरा में जिला प्रशासन ने ऐसे डॉक्टरों की पहचान के लिए विशेष जांच समिति गठित कर दी है। जिलाधिकारी ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) के नेतृत्व में टीम बनाई है, जो यह जांच करेगी कि कौन-कौन से सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस या प्राइवेट अस्पतालों में सेवाएं दे रहे हैं। शिकायत मिलने पर तत्काल जांच कर रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। प्रशासन ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने के संकेत दिए हैं।
सूत्रों के अनुसार, अब खुफिया निगरानी भी शुरू कर दी गई है। संदिग्ध डॉक्टरों के आवास, निजी क्लीनिक और उन अस्पतालों पर नजर रखी जा रही है जहां उनके काम करने की आशंका है। निगरानी के दौरान फोटो, वीडियो और अन्य डिजिटल साक्ष्य भी जुटाए जाएंगे ताकि कार्रवाई में किसी तरह की ढिलाई न रहे। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम इसलिए जरूरी है ताकि सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग रोका जा सके और मरीजों को बेहतर सेवाएं मिल सकें।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण श्रीवास्तव ने कहा कि जिलाधिकारी की ओर से बनी समिति को सभी शिकायतों की जांच का अधिकार दिया गया है। उन्होंने बताया कि जैसे ही कोई शिकायत मिलती है, टीम मौके पर जाकर जांच करेगी और रिपोर्ट तैयार की जाएगी। वहीं, एसएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता ने बताया कि संस्थान में कार्यरत स्थायी चिकित्सकों से पहले ही यह शपथ पत्र लिया गया है कि वे निजी प्रैक्टिस नहीं करेंगे। बावजूद इसके अगर कोई नियम तोड़ता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इस पूरे मामले ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता और अनुशासन को लेकर बहस फिर से तेज कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस में शामिल पाए जाते हैं, तो इसका सीधा असर गरीब और सामान्य मरीजों पर पड़ता है। ऐसे में हाईकोर्ट और प्रशासन की यह सख्ती स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।


