=सरदार पटेल बौद्धिक विचार मंच संयोजन में विभिन्न संगठनों ने भरी हुंकार
यूथ इंडिया समाचार
लखनऊ। बीते आठ वर्षो से सरदार पटेल वौद्धिक विचार मंच सरदार पटेल के आदर्शो और विचारधारा को आगे बढाने का काम करते हुए अब संयुक्त रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग की हो रही जातिवाद जनगणना को सही ढंग से कराने की लड़ाई लडऩे को सामने आया है। मंच के महामंत्री जगदीश शरण गंगवार के संयोजन में सेवानिवृत न्यायमूर्ति कुलपति उच्च प्रशासनिक व पुलिस एवं सेना के अधिकारियों प्रोफेसर वैज्ञानिक एवं अभियंताओं व शिक्षकों चिकित्सकों अध्यापकों व अधिवक्ताओं के गैर राजनैतिक संगठन के रूप में संयुक्त प्रेस वार्ता के जरिए कुर्मि समाज की पुरजोर वकालत करने उतरा है। पूर्व अपर मुख्य सचिव अरूण कुमार सिन्हा व पूर्व डीआईजी जेल बीआर वर्मा ने भी अपने तथस्त विचारों का समावेसन भी किया है।
उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों और सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों के बीच जातिवार जनगणना का मुद्दा फिर से उबाल पर है। सरदार पटेल बौद्धिक विचार मंच की बैठक ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। मंच ने साफ शब्दों में कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग की सही जातिवार गणना के बिना सामाजिक न्याय अधूरा है और विशेष रूप से कुर्मी समाज की उपेक्षा को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बताया गया कि कुर्मी समाज की जनसंख्या 12 प्रतिशत से अधिक बताई गई है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन अधूरा है। मंच का दावा है कि प्रदेश में कुर्मी समाज का प्रभाव 52 लोकसभा और लगभग 300 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका में रहता है, फिर भी नीतिगत स्तर पर सटीक आंकड़ों की भारी कमी है।
सबसे गंभीर आरोप केंद्र सरकार द्वारा जारी मकान सूचीकरण प्रारूप पर लगाए गए हैं। मंच के अनुसार, 22 जनवरी 2026 को जारी इस प्रारूप में परिवार प्रमुख की अनुसूचित जाति/जनजाति/अन्य का कॉलम तो है, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग की अलग से स्पष्ट पहचान नहीं दी गई है। इससे ओबीसी वर्ग की वास्तविक गणना प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
मंच ने इसे सांख्यिकीय अन्याय बताते हुए कहा कि यदि यही प्रारूप लागू रहा, तो पिछड़े वर्ग की सही जनसंख्या कभी सामने नहीं आ पाएगी, जिससे आरक्षण, योजनाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर सीधा असर पड़ेगा। प्रेस-वार्ता में शामिल विभिन्न संगठनों अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा, कुर्मी सभा लखनऊ, छत्रपति शिवाजी शोध संस्थान, केसीएफ, पटेल वेलफेयर ट्रस्ट ने एक स्वर में मांग रखी कि जनगणना के दौरान हर नागरिक अपनी उपजाति के साथ कुर्मी जाति अवश्य दर्ज कराए, ताकि वास्तविक आंकड़े सामने आ सकें।
इस मुद्दे पर पूर्व आईएएस अधिकारियों, शिक्षाविदों और सामाजिक नेताओं ने भी समर्थन जताया। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने प्रारूप में संशोधन नहीं किया तो यह मामला प्रदेश से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन का रूप ले सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जातिवार जनगणना का मुद्दा 2026-27 के चुनावी समीकरणों को सीधे प्रभावित कर सकता है। ओबीसी वोट बैंक को लेकर पहले से सक्रिय दलों के बीच यह मुद्दा बड़ा चुनावी हथियार बन सकता है।
जातिवार जनगणना की मांग, सरदार “कुर्मी समाज की अनदेखी नहीं सहेंगे”


