इस्लामाबाद
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल तेज हो गई है। रिपोर्टों के अनुसार ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची पाकिस्तान पहुंच चुके हैं, जबकि अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर के भी इस्लामाबाद पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि दोनों पक्षों के बयानों में भारी विरोधाभास देखने को मिल रहा है।
अमेरिका की ओर से दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान में ईरान के साथ सीधे शांति वार्ता की योजना है, जबकि ईरान ने स्पष्ट रूप से इससे इनकार किया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का कहना है कि ऐसी किसी भी बैठक की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और यदि बातचीत होती भी है तो वह सीधे नहीं बल्कि पाकिस्तान के माध्यम से होगी।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान एक संभावित मध्यस्थ की भूमिका निभाता दिख रहा है। अराघची की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व से हुई, जिसमें विदेश मंत्री और आर्मी चीफ शामिल रहे। माना जा रहा है कि पाकिस्तान दोनों देशों के बीच संदेशों के आदान-प्रदान का माध्यम बन सकता है।
इससे पहले अप्रैल में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता का पहला दौर भी पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुआ था, जो करीब 21 घंटे तक चलने के बावजूद विफल रहा था। उस बातचीत में होर्मुज स्ट्रेट के नियंत्रण और ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कोई सहमति नहीं बन पाई थी, जिससे तनाव और बढ़ गया था।
वर्तमान स्थिति में भी वही मुख्य विवाद फिर सामने हैं—अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना चाहता है और होर्मुज मार्ग की सुरक्षा पर नियंत्रण चाहता है, जबकि ईरान इसे अपने संप्रभु अधिकार का हिस्सा मानते हुए किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है।
इसी बीच अमेरिका और रूस जैसे देशों के बयानों ने भी माहौल को और जटिल बना दिया है। एक तरफ अमेरिका बातचीत और दबाव दोनों की रणनीति अपना रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान के भीतर भी बातचीत और सख्ती को लेकर दो अलग-अलग रुख दिखाई दे रहे हैं।
फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है कि इस्लामाबाद में कोई औपचारिक वार्ता होगी या यह केवल कूटनीतिक संपर्क तक सीमित रहेगा। लेकिन इतना तय है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में आ गया है।


