नई दिल्ली: सबरीमाला केस (Sabarimala case) पर सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने शुक्रवार को कहा कि आस्था से जुड़े मामलों का फैसला करते समय, संविधान को व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर रखना चाहिए। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मन की स्वतंत्रता और संवैधानिक ढांचे द्वारा निर्देशित होना जरूरी है। दरअसल, अदालत में चल रही यह बहस के दौरान मुद्दा उठा कि क्या धर्म के मामलों में न्यायपालिका का दखल जायज है ? इसपर पीठ ने संकेत दिया कि जब मुद्दा संवैधानिक अधिकारों का हो, तो केवल ‘धर्म’ की दुहाई देकर उसे न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं रखा जा सकता।
वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने तर्क दिया था कि अंतरात्मा का अधिकार बहुत व्यापक है और यह किसी भी व्यवस्था या धर्म पर सम्मानपूर्वक सवाल उठाने की स्वतंत्रता देता है। बेंच अब इस संदर्भ में धर्म, अंतरात्मा और अनुच्छेद 25 व 26 के परस्पर संबंधों की व्याख्या कर रही है। इससे पहले 9 जजों की बेंच ने 15 अप्रैल की सुनवाई में कहा था कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।
केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है।
सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।


