लखनऊ
राजधानी से उठे स्मार्ट प्रीपेड मीटर विवाद ने अब राष्ट्रीय स्तर पर दस्तक दे दी है। उपभोक्ताओं की सहमति के बिना स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जाने के खिलाफ मामला लोकसभा की याचिका समिति तक पहुंच गया है। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इस संबंध में याचिका दायर कर बिजली विभाग की कथित मनमानी पर रोक लगाने और पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने लोकसभा याचिका समिति के अध्यक्ष चंद्र प्रकाश जोशी से संपर्क कर पूरे मामले से अवगत कराया। याचिका में कहा गया है कि उपभोक्ताओं की अनुमति के बिना पुराने मीटर हटाकर स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा रहे हैं, जो विद्युत अधिनियम 2003 के प्रावधानों का उल्लंघन है।
याचिका में मांग की गई है कि बिना सहमति लगाए गए प्रीपेड मीटरों को हटाकर पुरानी व्यवस्था बहाल की जाए और नए कनेक्शनों में प्रीपेड सिस्टम को अनिवार्य बनाने की नीति समाप्त की जाए। साथ ही इस प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदार अधिकारियों और कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की भी मांग उठाई गई है।
परिषद का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी बदलाव का मुद्दा नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों और कानून के सम्मान से जुड़ा गंभीर विषय है। यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया तो यह मामला बड़े जनांदोलन का रूप ले सकता है। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में करीब 3.8 करोड़ उपभोक्ताओं के मीटर बदले जा रहे हैं, जिनमें से लगभग 70 लाख उपभोक्ताओं के मीटर बिना उनकी सहमति के प्रीपेड मोड में बदले जा चुके हैं।
इस बीच यह भी स्पष्ट किया गया है कि 1 अप्रैल 2026 को केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा जारी अधिसूचना में प्रीपेड मीटर को अनिवार्य नहीं बताया गया है, बल्कि उपभोक्ताओं को विकल्प देने की बात कही गई है। ऐसे में जबरन प्रीपेड व्यवस्था लागू करने पर सवाल उठ रहे हैं।
कुल मिलाकर, स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर बढ़ता विरोध अब राजनीतिक और संवैधानिक बहस का रूप लेता जा रहा है, जिसमें उपभोक्ताओं के अधिकार बनाम तकनीकी सुधार का मुद्दा केंद्र में आ गया है।


