यूथ इंडिया। नई दिल्ली
शरद कटियार
भारतीय राजनीति में कुछ फैसले केवल सरकारी निर्णय नहीं होते, बल्कि वे राजनीतिक इच्छाशक्ति और नेतृत्व क्षमता की पहचान बन जाते हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का निर्णय ऐसा ही एक फैसला था। अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने संसद के माध्यम से अनुच्छेद 370 और 35ए के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त कर दिया। इस निर्णय के केंद्र में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका को व्यापक रूप से देखा गया। समर्थकों के अनुसार यह एक ऐसा कदम था जिसे दशकों तक राजनीतिक रूप से असंभव माना जाता रहा।
यही कारण है कि आज देश के एक बड़े वर्ग में यह चर्चा सुनाई देती है कि जिस नेता ने अनुच्छेद 370 जैसे जटिल और संवेदनशील मुद्दे पर निर्णायक कदम उठाने का साहस दिखाया, क्या वही नेतृत्व देश के युवाओं की समस्याओं के समाधान के लिए भी उतनी ही दृढ़ता दिखा सकता है?
भारत दुनिया का सबसे युवा देश माना जाता है। विभिन्न जनसांख्यिकीय अध्ययनों के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, जबकि लगभग आधी आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है। हर वर्ष लाखों युवा शिक्षा पूरी कर रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। ऐसे में रोजगार, कौशल विकास, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और उच्च शिक्षा तक पहुंच सबसे बड़े राजनीतिक मुद्दे बन चुके हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में देरी और प्रतियोगी छात्रों की बढ़ती नाराजगी ने सरकारों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी की है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और अन्य राज्यों में कई बार छात्रों ने सडक़ों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद की है। युवाओं की सबसे बड़ी मांग है कि भर्ती प्रक्रिया समयबद्ध, पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाई जाए।
अमित शाह की राजनीतिक शैली को देखें तो उनकी सबसे बड़ी पहचान निर्णय लेने वाले नेता की रही है। भाजपा संगठन के विस्तार से लेकर देश के कई बड़े राजनीतिक अभियानों तक उन्होंने परिणाम आधारित कार्यशैली का प्रदर्शन किया है। समर्थकों का मानना है कि यदि यही दृष्टिकोण युवा नीतियों में पूरी ताकत से लागू किया जाए तो भर्ती प्रक्रिया, परीक्षा सुरक्षा और रोजगार सृजन जैसे क्षेत्रों में बड़े सुधार संभव हैं।
पिछले एक दशक में केंद्र सरकार ने कौशल विकास, स्टार्टअप और डिजिटल उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। देश में लाखों युवाओं ने स्टार्टअप क्षेत्र में कदम रखा है और भारत दुनिया के प्रमुख स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल हुआ है। लेकिन इसके साथ-साथ सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे करोड़ों युवाओं की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। वे चाहते हैं कि रिक्त पदों को समय पर भरा जाए, परीक्षाएं निष्पक्ष हों और चयन प्रक्रिया में अनिश्चितता समाप्त हो।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो आने वाला दशक युवाओं का दशक है। भारत की चुनावी राजनीति में युवा मतदाताओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। कोई भी राजनीतिक दल उनकी आकांक्षाओं की अनदेखी नहीं कर सकता। ऐसे में अमित शाह जैसे प्रभावशाली नेता के सामने केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि युवा भारत की उम्मीदों को पूरा करने की चुनौती भी है।
अनुच्छेद 370 हटाने का निर्णय समर्थकों के लिए दृढ़ नेतृत्व का प्रतीक है। उसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए भाजपा समर्थक मानते हैं कि यदि युवाओं से जुड़े मुद्दों पर भी उसी स्तर की प्राथमिकता और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई जाए तो रोजगार, भर्ती और शिक्षा क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन संभव है।
आज देश का युवा केवल घोषणाएं नहीं चाहता, वह परिणाम चाहता है। उसे समय पर परीक्षाएं, पारदर्शी भर्ती, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार चाहिए। यदि इन क्षेत्रों में ठोस सुधार दिखाई देते हैं तो यह किसी भी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि होगी।
भारतीय राजनीति में बड़े नेता वही बनते हैं जो बड़े फैसले लेने के साथ-साथ आम नागरिक की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान भी करें। इसलिए आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक रणनीति के लिए पहचाने जाने वाले अमित शाह, युवा भारत की आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में कितनी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। क्योंकि 21वीं सदी के भारत में सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति न कोई क्षेत्र है, न कोई जाति सबसे बड़ी शक्ति देश का युवा है।
राजनीति के चाणक्य ने धराशाई की राजनैतिक मनमानी


