लखनऊ। रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को ध्वस्त करने के लिए रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) द्वारा जारी आदेश ने उत्तर प्रदेश की राजनीति और कानूनी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर भाजपा इसे अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई बता रही है, जबकि समाजवादी पार्टी ने इसे शिक्षा संस्थान को निशाना बनाने और राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई करार दिया है।
इस बीच उत्तर प्रदेश के पूर्व सूचना आयुक्त एवं वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद हैदर अब्बास रिजवी ने आदेश की कानूनी वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी भी ध्वस्तीकरण कार्रवाई से पहले यह जांच जरूरी है कि संबंधित निर्माण के विरुद्ध निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। उनका कहना है कि यदि निर्माण कई वर्ष पहले हुआ और लंबे समय तक प्राधिकरण ने कोई आपत्ति नहीं जताई, तो अब अचानक ध्वस्तीकरण का आदेश कानूनी परीक्षण का विषय बनता है।
रिजवी के अनुसार, जिस समय विश्वविद्यालय की अधिकांश इमारतों का निर्माण हुआ, उस समय संबंधित क्षेत्र पंचायत क्षेत्र के अधीन था और शहरी विकास एवं नियोजन कानून लागू नहीं था। ऐसे में वर्तमान में शहरी विकास कानून के तहत की जा रही कार्रवाई के आधारों की भी न्यायिक समीक्षा होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि कुल 40 भवनों में से 38 को अवैध और दो को वैध माना गया है, तो इससे स्पष्ट है कि प्राधिकरण को निर्माण की जानकारी पहले से थी। ऐसे में समय रहते कार्रवाई न करना भी गंभीर कानूनी प्रश्न खड़ा करता है।
30 दिन में अपील का विकल्प
रिजवी ने बताया कि उत्तर प्रदेश अर्बन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1973 के तहत विश्वविद्यालय प्रशासन के पास 30 दिनों के भीतर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष (मंडलायुक्त) के समक्ष अपील करने का अधिकार है। यदि वहां राहत नहीं मिलती है तो इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की जा सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी विकास प्राधिकरण का आदेश न्यायालय के आदेश से ऊपर नहीं हो सकता।
हजारों छात्रों के भविष्य का सवाल
उन्होंने कहा कि जौहर यूनिवर्सिटी केवल एक भवन नहीं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों की शिक्षा का केंद्र है, जहां इंजीनियरिंग, पैरामेडिकल, कला और विज्ञान समेत कई पाठ्यक्रम संचालित होते हैं। ऐसे संस्थान को ध्वस्त करने जैसे निर्णय से पहले इसके सामाजिक और शैक्षणिक प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
रिजवी ने दावा किया कि विश्वविद्यालय के निर्माण में पूर्व मंत्री आजम खान ने व्यक्तिगत रूप से मेहनत की थी और स्थानीय लोगों ने भी श्रमदान कर इस संस्थान को खड़ा करने में योगदान दिया था। उनका कहना है कि यदि किसी निर्माण में कानूनी खामियां हैं तो उन्हें वैधानिक प्रक्रिया के तहत दूर किया जा सकता है, ध्वस्तीकरण ही एकमात्र विकल्प नहीं होना चाहिए।
उधर, समाजवादी पार्टी लगातार इस कार्रवाई का विरोध कर रही है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे शिक्षा के क्षेत्र में भी सांप्रदायिक राजनीति से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा है। अब सभी की नजर विश्वविद्यालय प्रशासन की कानूनी रणनीति और न्यायालय में होने वाली आगामी सुनवाई पर टिकी है।


