उद्घाटन की तस्वीरें चमकीं, लेकिन नवाबगंज अब भी रोशनी का इंतजार कर रहा है
आभास मिश्रा
लोकतंत्र में जनता केवल भाषण नहीं सुनती, वह परिणाम देखती है। चुनावी मंचों से लेकर उद्घाटन समारोहों तक किए गए वादे जनता के लिए राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि भरोसे का दस्तावेज होते हैं। जब फीता काटकर किसी योजना का शुभारंभ किया जाता है, तब लोगों को उम्मीद होती है कि अब उनकी समस्याओं का समाधान होगा। लेकिन जब समय बीतने के बाद भी तस्वीर नहीं बदलती, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। नवाबगंज की बिजली व्यवस्था आज ऐसे ही सवालों के घेरे में खड़ी है।
14 फरवरी 2026 को नवाबगंज विद्युत उपकेंद्र पर अलग टाउन फीडर का शुभारंभ किया गया। अमृतपुर विधायक सुशील शाक्य ने स्वयं इसका उद्घाटन करते हुए दावा किया था कि अब नगरवासियों को ग्रामीण फीडर से मुक्ति मिलेगी और लगभग 21 घंटे 30 मिनट शहरी मानकों के अनुरूप बिजली आपूर्ति मिलेगी। यह भी कहा गया कि लो वोल्टेज, बार-बार ट्रिपिंग और अनियमित कटौती जैसी परेशानियां बीते दिनों की बात हो जाएंगी। उस समय लोगों ने इसे विकास की नई शुरुआत मानकर स्वागत किया।
लेकिन पांच महीने बीतने के बाद भी नगर की हकीकत कुछ और कहानी कह रही है। लोगों का कहना है कि बिजली आज भी ग्रामीण क्षेत्रों जैसी ही मिल रही है। दिन में कई बार कटौती, लगातार ट्रिपिंग और लो वोल्टेज की समस्या जस की तस बनी हुई है। भीषण गर्मी में जब बिजली बार-बार चली जाती है तो सबसे अधिक परेशानी बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों, विद्यार्थियों और छोटे कारोबारियों को होती है। घरों के कूलर और पंखे केवल सजावट की वस्तु बनकर रह जाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अलग टाउन फीडर बन चुका है, तो उसका लाभ आखिर नगर तक क्यों नहीं पहुंच रहा? क्या कोई तकनीकी बाधा है? क्या विभागीय लापरवाही है? या फिर उद्घाटन के बाद योजना अपनी गति खो बैठी? यदि कोई समस्या है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। जनता को सच्चाई जानने का अधिकार है। लेकिन यदि कोई बाधा नहीं है, तो फिर वादा पूरा होने में देरी क्यों?
बिजली विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार नवाबगंज विद्युत उपकेंद्र से 13,608 उपभोक्ता जुड़े हैं। इनमें करीब 3,000 नगर क्षेत्र के कनेक्शन हैं और 456 उपभोक्ता शहरी दरों पर बिजली बिल जमा करते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब बिल शहरी मानकों के अनुसार लिया जा रहा है, तो सुविधा ग्रामीण स्तर की क्यों दी जा रही है? अधिकार और दायित्व दोनों साथ-साथ चलते हैं। उपभोक्ता यदि समय पर भुगतान कर रहा है तो विभाग की जिम्मेदारी भी तय होती है।
आज बिजली केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की आधारभूत आवश्यकता है। बच्चों की पढ़ाई, अस्पताल, पेयजल आपूर्ति, व्यापार, उद्योग, इंटरनेट और डिजिटल सेवाएं—सब कुछ बिजली पर निर्भर है। अनियमित आपूर्ति केवल असुविधा नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और आम जीवन पर सीधा प्रहार है। लो वोल्टेज और बार-बार कटौती से उपभोक्ताओं के विद्युत उपकरण खराब हो रहे हैं, जिसका आर्थिक बोझ भी जनता ही उठा रही है।
यह भी सच है कि बिजली व्यवस्था केवल किसी एक जनप्रतिनिधि के नियंत्रण में नहीं होती। इसमें बिजली विभाग, प्रशासन और शासन की समान जिम्मेदारी होती है। लेकिन जब किसी योजना का श्रेय लिया जाता है, तब उसकी सफलता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है। जनता उद्घाटन समारोह की तस्वीरें नहीं, बल्कि अपने घरों में जलते बल्ब और चलते पंखे याद रखती है।
अब समय दोषारोपण का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है। बिजली विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि टाउन फीडर का लाभ अब तक पूरी तरह लागू क्यों नहीं हुआ। यदि कोई तकनीकी या प्रशासनिक बाधा है तो उसकी समयबद्ध कार्ययोजना सार्वजनिक की जाए। वहीं जनप्रतिनिधियों को भी जनता के बीच आकर यह बताना चाहिए कि उनके वादों को पूरा करने के लिए अब तक क्या प्रयास हुए और नगर को शहरी मानकों की बिजली आखिर कब मिलेगी।
नवाबगंज अब उद्घाटन की तस्वीरें नहीं, परिणाम चाहता है। विकास का वास्तविक अर्थ तब है, जब योजनाएं कागज और मंच से निकलकर आम आदमी के जीवन में बदलाव लाएं। जनता को अब आश्वासनों की नहीं, बल्कि नियमित, गुणवत्तापूर्ण और भरोसेमंद बिजली चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है—और यह विश्वास केवल वादों से नहीं, उन्हें समय पर पूरा करने से कायम रहता है।


