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Saturday, September 26, 2026

बारिश का कहर और प्रशासन की परीक्षा

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बारिश प्रकृति का वरदान है, लेकिन जब यही बारिश लगातार और असामान्य रूप से बरसने लगे तो वरदान कब संकट में बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। उत्तर प्रदेश में इस समय मौसम का यही बदला हुआ रूप दिखाई दे रहा है। लखनऊ से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और चित्रकूट तक भारी बारिश, जलभराव, नदियों के बढ़ते जलस्तर और फ्लैश फ्लड की आशंका ने प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संभावित बाढ़ और आकस्मिक बाढ़ को देखते हुए जिलाधिकारियों को फील्ड में उतरकर राहत एवं बचाव कार्यों की निगरानी करने के निर्देश दिए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों पर नजर रखने, नदियों के जलस्तर की लगातार निगरानी करने और असुरक्षित स्थानों पर रह रहे लोगों को राहत शरणालयों तक पहुंचाने के निर्देश इस बात का संकेत हैं कि स्थिति को हल्के में लेने की गुंजाइश नहीं है।

लेकिन सवाल केवल सरकारी निर्देशों का नहीं है। असली परीक्षा उन निर्देशों के जमीन पर उतरने की है। कागज पर जारी आदेश तभी सार्थक होंगे, जब प्रशासनिक मशीनरी गांवों, बस्तियों, निचले इलाकों और नदी किनारे बसे लोगों तक समय रहते पहुंचेगी।

चित्रकूट की मंदाकिनी नदी का जलस्तर 126.500 मीटर के पार पहुंचना और रामघाट पर बाढ़ का खतरा बढ़ना चिंता का विषय है। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लेना तथा रामघाट पर पीएसी की मोटर बोट तैनात करना तत्काल सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम है। मगर नदी किनारे रहने वाले ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए निरंतर निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

दूसरी ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर और उत्तराखंड में भी भारी बारिश की चेतावनी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा बढ़ना इस बात की याद दिलाता है कि खराब मौसम केवल बारिश तक सीमित नहीं रहता। सड़कें बंद हो सकती हैं, यातायात प्रभावित हो सकता है और दूरदराज के इलाकों में राहत पहुंचाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
लखनऊ में स्कूलों को बंद रखने का निर्णय भी इसी सुरक्षा दृष्टिकोण का हिस्सा है। बच्चों को खराब मौसम में घर से बाहर न निकलने देना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसी तरह लखनऊ एयरपोर्ट की ओर से यात्रियों को अतिरिक्त समय लेकर घर से निकलने की सलाह व्यावहारिक कदम है। भारी बारिश में जलभराव और यातायात जाम के कारण एयरपोर्ट पहुंचने में देरी संभव है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने से बेहतर है कि उससे पहले तैयारी पूरी कर ली जाए। नदियों के किनारे बसे गांवों की पहचान, राहत शिविरों की उपलब्धता, मोटर बोट और बचाव दलों की तैनाती, संचार व्यवस्था और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की तैयारी पहले से होनी चाहिए।
साथ ही आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। नदी, नाले और जलभराव वाले क्षेत्रों में अनावश्यक जाने से बचना चाहिए। मौसम खराब होने पर यात्रा टालना और प्रशासन की चेतावनियों का पालन करना ही समझदारी है।
बारिश को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसके लिए सरकार की तैयारी, प्रशासन की सक्रियता और जनता की सतर्कता,तीनों का साथ जरूरी है।
आज जरूरत केवल अलर्ट जारी करने की नहीं, बल्कि हर अलर्ट को जमीन पर कार्रवाई में बदलने की है। क्योंकि बाढ़ का पानी किसी फाइल की गति नहीं देखता,वह केवल रास्ता तलाशता है। प्रशासन की सफलता इसी में है कि संकट का पानी लोगों की जिंदगी और घरों तक पहुंचने से पहले सुरक्षा की व्यवस्था पहुंच जाए।

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