10 लाख नामों पर मंडरा रहा खतरा
न्यूयॉर्क। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने देशभर की मतदाता सूचियों की जांच और राष्ट्रीय मतदाता डेटाबेस तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है। भारत में चलने वाली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (एसआईआर) से इसकी तुलना की जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रक्रिया के दायरे में अमेरिका के करीब 26 लाख भारतवंशी मतदाता भी आएंगे और इनमें से करीब 10 लाख नामों पर जांच या हटाए जाने का खतरा बताया जा रहा है।
इस प्रक्रिया के लिए करीब 125 करोड़ रुपये का फंड जारी किए जाने की बात सामने आई है। ट्रम्प प्रशासन ने इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एन्फोर्समेंट (आईसीई) को डेटाबेस की निगरानी की जिम्मेदारी दी है। सभी 50 राज्यों में मतदाता सूची की जानकारी को इमिग्रेशन रिकॉर्ड और अन्य सरकारी रिकॉर्ड से मिलाकर सत्यापन किया जाएगा।
भारत की तरह अमेरिका में घर-घर जाकर मतदाताओं का सर्वे नहीं होगा। कंप्यूटर आधारित रिकॉर्ड मिलान के जरिए मतदाताओं की जानकारी की जांच की जाएगी। किसी रिकॉर्ड में नाम या विवरण का मिलान नहीं होने पर संबंधित मतदाता से दोबारा सत्यापन कराया जा सकता है। ऐसे मामलों में नाम सूची से हटाए जाने की आशंका जताई जा रही है।
भारतवंशियों पर खास नजर की आशंका: न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में भारतवंशी मतदाताओं की संख्या और राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण है। अलग-अलग राज्यों में मतदाता पंजीकरण और पहचान के नियम अलग होने के कारण नई जांच प्रक्रिया का असर व्यापक हो सकता है। हालांकि, वास्तव में कितने नाम हटेंगे, यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
ट्रम्प लंबे समय से मतदान के लिए फोटो पहचान पत्र अनिवार्य करने के पक्षधर रहे हैं। उनका समर्थन ‘सेव अमेरिका एक्ट’ के लिए भी है, जिसमें मतदाता पंजीकरण के दौरान नागरिकता का दस्तावेज और मतदान के समय फोटो आईडी अनिवार्य करने का प्रस्ताव है।
अमेरिका में भारत की तरह कोई केंद्रीय चुनाव आयोग पूरे देश के चुनाव नहीं कराता। चुनावों का संचालन मुख्य रूप से राज्य और स्थानीय प्रशासन करते हैं, इसलिए मतदाता पहचान और पंजीकरण के नियम भी राज्यवार अलग हैं। इसी कारण राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता डेटाबेस तैयार करने की पहल राजनीतिक और कानूनी विवाद का विषय बन सकती है।
टेक्सास में पहले भी मतदाता सूची से हजारों नाम हटाने को लेकर विवाद अदालत तक पहुंच चुका है। ऐसे में ट्रम्प प्रशासन की नई पहल को भी कानूनी चुनौती मिलने की संभावना जताई जा रही है।


