29 C
Lucknow
Thursday, August 27, 2026

ईद-ए-मिलादुन्नबी : सारी दुनिया के लिए दया और करुणा का संदेश देने वाला त्योहार

Must read

(सरवत अली-विनायक फीचर्स)

इस्लामी कैलेंडर का तीसरा महीना रबी-उल-अव्वल जब आता है, तो पूरी दुनिया के मुसलमानों के दिलों में एक खास रोशनी और खुशी आ जाती है। इसी महीने की 12 तारीख को पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था। इसी खुशी में मनाया जाने वाला त्योहार ईद-ए-मिलादुन्नबी कहलाता है।
यह सिर्फ जन्मदिन का जश्न नहीं है। यह उस महान व्यक्ति की याद है, जिन्हें कुरान में “रहमतुल-लिल-आलमीन” यानी सारी दुनिया के लिए दया कहा गया है। उनका जन्म 570 ईस्वी में अरब के शहर मक्का में हुआ था। उस समय को अरब में अंधकार का युग कहा जाता था। बेटियों को जिंदा दफना दिया जाता था, गुलामों पर अत्याचार होता था, कबीलों में खूनी लड़ाइयाँ होती थीं। ऐसे अंधेरे में उनका जन्म एक रोशनी बनकर आया।
उन्होंने बचपन में ही अनाथ होना देखा। पिता का साया जन्म से पहले उठ गया, माँ भी 6 साल की उम्र में चल बसीं। इसके बाद दादा और फिर चाचा अबू तालिब ने उन्हें पाला। वे बचपन से ही सच्चे और ईमानदार के नाम से मशहूर थे। मक्का के लोग अपना कीमती सामान उनकी देखरेख में रखते थे।
40 साल की उम्र में हिरा की गुफा में उन्हें पहला ईश्वरीय संदेश मिला। इसके बाद 23 साल तक उन्होंने इंसानियत को एक ईश्वर की पूजा, बराबरी, न्याय और प्रेम का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि किसी गोरे को काले पर, किसी अरबी को गैर-अरबी पर कोई बड़प्पन नहीं, बड़प्पन सिर्फ अच्छे कर्मों से है।

मिलादुन्नबी मनाने का असली मकसद क्या है?
आज कई जगहों पर इस दिन जुलूस, सभाएँ और प्रार्थना सभाएँ होती हैं। घरों, मस्जिदों और दरगाहों को रोशनी से सजाया जाता है। भोजन और दान बाँटा जाता है। पैगंबर साहब की जीवनी सुनाई जाती है। लेकिन धर्मगुरु कहते हैं कि सिर्फ झंडे और रोशनी से प्रेम पूरा नहीं होता। असली प्रेम यह है कि हम उनके बताए रास्ते को अपनी जिंदगी में उतारें।

पैगंबर साहब के जीवन के कुछ नियम आज भी दुनिया के लिए रास्ता हैं।

1. शांति और दया का संदेश: उन्होंने हमेशा बदले की जगह माफी को चुना। मक्का जीत के दिन, जिस शहर ने उन्हें सताया, घर से निकाला, उसी शहर वालों से उन्होंने कहा – “आज तुम पर कोई बदला नहीं, जाओ तुम सब आजाद हो।”

2. अनाथों, गरीबों और पड़ोसियों का ख्याल: उन्होंने कहा, “वो व्यक्ति सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता जो खुद पेट भर कर सो जाए और उसका पड़ोसी भूखा रहे।”

3. औरतों और बेटियों को सम्मान: जिस समाज में बेटियों को बोझ समझा जाता था, उन्होंने कहा – “जिसने दो बेटियों की अच्छी परवरिश की, वो जन्नत में मेरे साथ होगा।”

4. पढ़ाई-लिखाई: उनका पहला संदेश ही ‘इकरा’ था, यानी पढ़ो। उन्होंने कहा, “ज्ञान हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत का कर्तव्य है।”

5. पर्यावरण और जानवरों से प्रेम: उन्होंने कहा कि अगर प्रलय भी आ रही हो और तुम्हारे हाथ में एक पौधा हो, तो उसे लगा दो।

भारत में मिलादुन्नबी की एक अलग ही रंगत है। यह देश मिली जुली संस्कृति का देश है। यहाँ के जुलूसों में सभी धर्म के लोग शामिल होते हैं।
आज के दौर में जब नफरत, हिंसा और सोशल मीडिया पर अफवाहों का बाजार गर्म है, तब पैगंबर साहब की जीवनी और भी ज्यादा जरूरी हो जाती है। उन्होंने कहा था – “तुम में सबसे बेहतर वो है, जिसका व्यवहार सबसे अच्छा है।”
इसलिए ईद-ए-मिलादुन्नबी केवल एक रस्म नहीं, एक संकल्प का दिन है। यह संकल्प कि हम झूठ नहीं बोलेंगे, किसी का हक नहीं मारेंगे, अपने पड़ोसी का ख्याल रखेंगे। (विनायक फीचर्स)

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article