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Thursday, August 27, 2026

टैबलेट से जेन-जी को लुभाना,डिजिटल सशक्तीकरण या युवा राजनीति का नया समीकरण?

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शरद कटियार
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 25 लाख युवाओं को टैबलेट देने की तैयारी को केवल एक कल्याणकारी योजना मानकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन सवाल यह है कि सरकार आखिर इतनी बड़ी संख्या में टैबलेट क्यों बांट रही है? इसके पीछे केवल युवाओं को डिजिटल संसाधन उपलब्ध कराने की चिंता है या इसके साथ कोई बड़ा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक लक्ष्य भी जुड़ा है?
स्वामी विवेकानंद युवा सशक्तीकरण योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2026-27 में 25 लाख टैबलेट के लिए 2,374.60 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। आंकड़ा बड़ा है और इसका संदेश भी बड़ा है—सरकार प्रदेश के युवाओं को यह बताना चाहती है कि डिजिटल युग में उन्हें पीछे नहीं छोड़ा जाएगा।
लेकिन लोकतंत्र में हर सरकारी योजना को उसके उद्देश्य के साथ-साथ उसके राजनीतिक संदर्भ में भी देखना चाहिए।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में युवा किसी भी सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक समूहों में हैं। रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएं, कौशल विकास और डिजिटल सुविधाएं सीधे युवाओं के भविष्य से जुड़ी हैं। इसलिए युवाओं को लक्षित करने वाली कोई भी बड़ी योजना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक महत्व भी रखती है।
टैबलेट ऐसा माध्यम है जिसका प्रभाव केवल घोषणा तक सीमित नहीं रहता। जब किसी विद्यार्थी को सरकार की ओर से एक उपकरण मिलता है, तो उसके साथ एक प्रत्यक्ष अनुभव भी जुड़ता है,सरकार ने मुझे कुछ दिया है।
यही कारण है कि ऐसी योजनाएं राजनीतिक संचार का भी प्रभावी माध्यम बन सकती हैं। सरकार विकास और तकनीक की छवि के साथ युवा वर्ग तक पहुंच बनाना चाहती है तो टैबलेट जैसी योजना उसके लिए उपयोगी साधन हो सकती है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि योजना केवल राजनीतिक लाभ के लिए है। किसी योजना में राजनीतिक लाभ की संभावना और सार्वजनिक उपयोगिता—दोनों एक साथ मौजूद हो सकते हैं। असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक उद्देश्य के साथ सार्वजनिक हित भी मजबूत है?
युवाओं की सबसे बड़ी चिंता आज भी रोजगार है। ऐसे में टैबलेट रोजगार की समस्या का सीधा समाधान नहीं है। टैबलेट नौकरी नहीं देता, लेकिन नौकरी तक पहुंचने के साधन जरूर उपलब्ध करा सकता है।
यहीं सरकार की रणनीति समझ में आती है। यदि युवा को सीधे रोजगार उपलब्ध कराना कठिन है, तो उसे कौशल, डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन प्रशिक्षण और रोजगार के डिजिटल मंचों से जोड़ना अपेक्षाकृत आसान रास्ता है।
लेकिन यहां सरकार से बड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए,क्या डिजिटल उपकरण बेरोजगारी की जड़ को खत्म कर सकता है?
जवाब साफ है…नहीं।
उद्योगों में नए रोजगार, निजी निवेश, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा किए बिना केवल टैबलेट बांटने से बेरोजगारी का संकट समाप्त नहीं होगा।
सरकार 25 लाख टैबलेट पर 2,374.60 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान कर रही है। यह सार्वजनिक धन है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने टैबलेट बांटे जाएंगे, बल्कि यह भी होना चाहिए कि इस खर्च से कितने युवाओं की जिंदगी बदलेगी?
सरकार को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि कितने युवाओं को टैबलेट मिलने के बाद रोजगार मिला, कितनों ने कौशल प्रशिक्षण पूरा किया, कितनों ने स्वरोजगार शुरू किया और कितने विद्यार्थी उच्च शिक्षा में आगे बढ़े।
योजना का मूल्यांकन वितरण समारोहों की संख्या से नहीं, परिणामों से होना चाहिए।
योजना की सबसे कमजोर कड़ी यहीं हो सकती है। टैबलेट देना आसान है, लेकिन उसे उपयोगी बनाना कठिन।
ग्रामीण क्षेत्र में यदि इंटरनेट कमजोर है, विद्यार्थी के पास डेटा का खर्च उठाने की क्षमता नहीं है, डिजिटल सामग्री गुणवत्तापूर्ण नहीं है और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं है, तो टैबलेट कुछ समय बाद अलमारी या बैग में पड़ा उपकरण बन सकता है।
इसलिए सरकार को टैबलेट के साथ डिजिटल शिक्षा पैकेज देना चाहिए,मुफ्त या सस्ता इंटरनेट, प्रमाणित पाठ्यक्रम, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार पोर्टल, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण और करियर मार्गदर्शन।
तभी 25 लाख टैबलेट 25 लाख डिजिटल अवसर बनेंगे।
राजनीति में कोई भी सरकार अपने काम का श्रेय लेना चाहती है। यह लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है। सरकार टैबलेट बांटेगी, तस्वीरें होंगी, लाभार्थी होंगे और निश्चित रूप से इसका राजनीतिक संदेश भी जाएगा।
लेकिन राजनीतिक संदेश तभी टिकता है जब लाभार्थी को वास्तविक फायदा मिले।
अगर टैबलेट मिलने के बाद युवा प्रतियोगी परीक्षा पास करता है, कोई कौशल सीखकर नौकरी पाता है, कोई डिजिटल कारोबार शुरू करता है या कोई ग्रामीण विद्यार्थी उच्च शिक्षा की बेहतर तैयारी कर पाता है, तो सरकार की योजना का राजनीतिक संदेश अपने आप मजबूत होगा।
लेकिन यदि उपकरण वितरण के बाद योजना की निगरानी खत्म हो गई तो यही योजना सवालों के घेरे में भी आ सकती है।
आज की जेन-जी पिछली पीढ़ियों से अलग है। वह केवल सरकारी घोषणा सुनकर संतुष्ट नहीं होती। वह इंटरनेट पर जानकारी खोजती है, तुलना करती है, सवाल पूछती है और सरकार के दावों को भी परखती है।
इसलिए सरकार यदि जेन-जी के हाथ में टैबलेट दे रही है तो उसे यह भी समझना होगा कि वह पीढ़ी केवल उपभोक्ता नहीं बनेगी। वह इसी टैबलेट से सरकार के कामकाज पर सवाल भी पूछेगी।
यही इस योजना की सबसे दिलचस्प राजनीतिक विडंबना है।
जिस टैबलेट के जरिए सरकार युवाओं तक अपना संदेश पहुंचाएगी, उसी टैबलेट के जरिए युवा सरकार से रोजगार, परीक्षा, शिक्षा और विकास का हिसाब भी मांगेंगे।
25 लाख टैबलेट बांटना बड़ी उपलब्धि दिखाई दे सकती है, लेकिन असली परीक्षा उसके बाद शुरू होगी।क्या युवाओं को गुणवत्तापूर्ण डिजिटल शिक्षा मिलेगी?क्या उन्हें कौशल से रोजगार तक पहुंचाया जाएगा?
क्या ग्रामीण और गरीब विद्यार्थियों को वास्तविक प्राथमिकता मिलेगी?
क्या खरीद और वितरण प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी?
क्या सरकार पांच वर्ष बाद यह बता सकेगी कि योजना से कितने युवाओं को वास्तविक लाभ मिला?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह योजना युवा सशक्तीकरण की मिसाल बनी या केवल राजनीतिक संदेश देने वाली एक बड़ी सरकारी योजना।
सरकार को टैबलेट वितरण के साथ प्रत्येक लाभार्थी के लिए डिजिटल प्रगति का एक रास्ता तैयार करना चाहिए। टैबलेट मिले तो उसके साथ कौशल पाठ्यक्रम मिले, पाठ्यक्रम पूरा हो तो प्रमाणपत्र मिले, प्रमाणपत्र के बाद उद्योग से संपर्क मिले और रोजगार अथवा स्वरोजगार की दिशा में अवसर मिले।
तभी सरकार का 2,374.60 करोड़ रुपये का निवेश केवल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खरीद नहीं रहेगा, बल्कि मानव पूंजी में निवेश बनेगा।राजनीतिक मंशा हो या सामाजिक उद्देश्य,दोनों में कोई बुराई नहीं, बशर्ते अंतिम लाभ युवा को मिले।सरकार को युवाओं के हाथ में केवल टैबलेट नहीं, तकनीक के साथ हुनर और हुनर के साथ अवसर देना होगा।
क्योंकि चुनावी राजनीति में टैबलेट कुछ समय के लिए सरकार की उपलब्धि बन सकता है, लेकिन युवा के जीवन में रोजगार और आत्मनिर्भरता आ जाए तो वही टैबलेट उसके लिए भविष्य बदलने वाला उपकरण बन जाता है।
युवा को उपकरण देना राजनीति हो सकती है, लेकिन उस उपकरण से युवा का भविष्य बनाना ही असली सुशासन है।

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