हाईकोर्ट ने किराएदारी विनियमन अधिनियम की पांच धाराएं रद्द कीं, जरूरत की सीमा तक 1972 की व्यवस्था प्रभावी
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किराएदारी विनियमन अधिनियम, 2021 की पांच महत्वपूर्ण धाराओं को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। अदालत के फैसले के बाद मकान मालिकों द्वारा किराए में मनमानी अथवा स्वत: निर्धारित प्रतिशत के आधार पर बढ़ोतरी किए जाने का आधार समाप्त हो गया है।
खंडपीठ ने अधिनियम की धारा 8, 9, 10, 38 और 42 को रद्द किया है। खास तौर पर धारा 9 के तहत आवासीय परिसरों के किराए में पांच प्रतिशत और गैर-आवासीय परिसरों में सात प्रतिशत वार्षिक वृद्धि की व्यवस्था थी। अब इस तरह की स्वचालित सालाना बढ़ोतरी लागू नहीं होगी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इन प्रावधानों के हटने से उत्पन्न कानूनी स्थिति में आवश्यक सीमा तक उत्तर प्रदेश नगरीय भवन (किराए पर देने, किराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 की संबंधित व्यवस्था प्रभावी होगी। हालांकि इसे 1972 के कानून की पूरी व्यवस्था की स्वत: वापसी के रूप में नहीं देखा जाएगा।
फैसले के बाद किराया तय करने में पहले से निर्धारित किराया, किराएदारी की अवधि और दोनों पक्षों के बीच मौजूद वैध समझौते समेत संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाएगा। यानी अब हर साल एक निश्चित प्रतिशत के आधार पर किराया बढ़ाना अनिवार्य नहीं होगा।
फैसले से उन किरायेदारों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन पर 2021 के अधिनियम के तहत निर्धारित वार्षिक वृद्धि का दबाव बनाया जा रहा था। वहीं मकान मालिकों को भी किराया निर्धारण के लिए लागू कानूनी प्रक्रिया और मौजूदा किराएदारी शर्तों का पालन करना होगा।


