– ब्रजेश पाठक के रुख ने बढ़ाई सियासी हलचल
– ओबीसी को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए महंगा पड़ना तय
प्रशांत कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आरक्षण का सवाल कभी केवल नौकरी और प्रवेश में हिस्सेदारी का प्रश्न नहीं रहा। यह सामाजिक प्रतिनिधित्व, सत्ता में भागीदारी और उस भरोसे का सवाल भी है, जिसे पिछड़े वर्गों ने अलग-अलग दौर में राजनीतिक दलों के साथ जोड़कर देखा है। ऐसे समय में जब 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है, आरक्षण को लेकर शुरू हुई बहस को हल्के में लेना भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीतिक भूल साबित हो सकता है।
हाल के दिनों में आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन कर रहे युवाओं से उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की बातचीत और उन्हें यह भरोसा दिलाना कि उनके साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा, राजनीतिक रूप से स्वाभाविक कदम हो सकता है। पाठक ने यह भी कहा कि आरक्षण व्यवस्था में सुधार की जरूरत है, आरक्षण समाप्त करने की नहीं। लेकिन राजनीति में केवल कहे गए शब्द नहीं, उनका समय और उनका प्रभाव भी मायने रखता है। आरक्षण विरोधी समूहों से सरकार के वरिष्ठ चेहरे का संवाद एक वर्ग को भरोसा देता है तो दूसरे वर्ग में यह सवाल भी पैदा करता है कि आखिर उसकी चिंता कौन सुनेगा।
मंडल आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए देश में अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी का अनुमान करीब 52 प्रतिशत लगाया था। आयोग ने 3,743 जातियों और समुदायों को पिछड़े वर्ग के रूप में चिह्नित किया था।
मंडल आयोग की सिफारिशों में आबादी के अनुपात में 52 प्रतिशत आरक्षण की मांग का आधार मौजूद था, लेकिन उस समय लागू आरक्षण की कुल सीमा को ध्यान में रखते हुए आयोग ने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की।
इसके बाद 1990 में केंद्र सरकार ने सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में 27 प्रतिशत आरक्षण का आदेश जारी किया। 1992 के इंद्रा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था को व्यापक रूप से बरकरार रखा।
यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में उठने वाली आवाजों के पीछे केवल वर्तमान की नौकरी नहीं, बल्कि तीन दशक से अधिक पुरानी सामाजिक चेतना भी काम करती है।
मंडल आयोग का 52 प्रतिशत का आंकड़ा आज की जनसंख्या का आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भी स्पष्ट करता है कि 1931 के बाद नियमित जनगणना में जातिगत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं और मंडल आयोग ने ओबीसी आबादी का अनुमान 52 प्रतिशत लगाया था।
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है—जब ओबीसी की वर्तमान आबादी का प्रमाणिक और व्यापक जातिगत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, तो आरक्षण की वर्तमान जरूरत और प्रतिनिधित्व का आकलन किस आधार पर होगा?
यही वजह है कि जातिगत जनगणना की मांग केवल राजनीतिक नारा नहीं रह गई है। पिछड़े वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अब यह जानना चाहता है कि उसकी वास्तविक संख्या कितनी है, सरकारी नौकरियों में उसका प्रतिनिधित्व कितना है, उच्च शिक्षा में उसकी हिस्सेदारी कितनी है और सत्ता तथा संस्थानों में उसकी भागीदारी कितनी है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीतिक सफलता में गैर-यादव ओबीसी की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2022 के चुनावों से पहले उपलब्ध सीएसडीएस-आधारित आंकड़ों में भाजपा और उसके सहयोगियों को गैर-यादव ओबीसी के बीच मजबूत समर्थन मिला था। आज 2027 के चुनाव से पहले भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों गैर-यादव पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।
यानी जिस सामाजिक समीकरण ने भाजपा को लंबे समय तक मजबूती दी, उसके केंद्र में अब एक नया सवाल खड़ा है,प्रतिनिधित्व किसका और कितना?
यही वह जगह है जहां समाजवादी पार्टी को राजनीतिक अवसर दिखाई देता है। अखिलेश यादव का पीडीए,पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक,सिर्फ चुनावी नारा नहीं, बल्कि सामाजिक हिस्सेदारी के प्रश्न को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश है। भाजपा यदि आरक्षण के सवाल पर अपने परंपरागत सामाजिक गठजोड़ के भीतर पैदा हो रही बेचैनी को समय रहते नहीं समझती तो सपा को उस असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने का अवसर मिल सकता है। हाल के राजनीतिक विश्लेषण भी संकेत कर रहे हैं कि यूपी में भाजपा और सपा के बीच पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर नई प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आरक्षण विरोधी आंदोलन के बीच भाजपा का केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व इस मुद्दे पर स्पष्ट, संतुलित और एकसमान राजनीतिक भाषा क्यों नहीं सामने रख रहा?
एक ओर पार्टी को सामान्य वर्ग के युवाओं की मेरिट और अवसर संबंधी चिंता सुननी है, दूसरी ओर उसे ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति अपना भरोसा कायम रखना है। दोनों के बीच संतुलन ही जिम्मेदार राजनीति है।
समस्या तब पैदा होती है जब एक वर्ग को यह दिखाई देने लगे कि उसकी बात सुनने के लिए नेता सड़क पर मौजूद हैं, लेकिन दूसरे वर्ग की आशंकाओं का जवाब देने के लिए पार्टी का स्पष्ट राजनीतिक नेतृत्व सामने नहीं आ रहा।
ब्रजेश पाठक का संवाद इसी कारण राजनीतिक बहस का विषय बना है। इसे केवल एक नेता का बयान मानकर खारिज करना आसान होगा, लेकिन चुनावी राजनीति में प्रतीक भी संदेश बन जाते हैं। और आरक्षण जैसा विषय प्रतीकों से कहीं ज्यादा संवेदनशील है।
यह मान लेना भी जल्दबाजी होगी कि आरक्षण को लेकर पैदा हुई नाराजगी सीधे समाजवादी पार्टी के खाते में चली जाएगी। पिछड़े वर्ग का राजनीतिक व्यवहार एकरूप नहीं है। यादव, कुर्मी, निषाद, राजभर, पाल, लोधी, गुर्जर और अन्य पिछड़ी जातियों के राजनीतिक हित अलग-अलग हैं। भाजपा ने पिछले एक दशक में इन्हीं सामाजिक समूहों के बीच अलग-अलग स्तर पर अपना आधार बनाया है।
सपा के सामने भी चुनौती यही है कि पीडीए की राजनीति को नारे से आगे ले जाकर वास्तविक प्रतिनिधित्व और भागीदारी का भरोसा कैसे बनाया जाए।
यदि सपा केवल भाजपा विरोध को आधार बनाएगी तो उसे सीमित लाभ मिलेगा। लेकिन यदि वह आरक्षण, जातिगत आंकड़ों, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को एक स्पष्ट सामाजिक न्याय के एजेंडे में बदल देती है तो उसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
आरक्षण पर बहस को अक्सर मेरिट बनाम आरक्षण के कृत्रिम संघर्ष में बदल दिया जाता है। जबकि वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या समाज के अलग-अलग वर्गों को शिक्षा, संसाधन, अवसर और प्रतिस्पर्धा के लिए समान प्रारंभिक परिस्थितियां उपलब्ध हैं?
मंडल आयोग की मूल सोच इसी असमानता से जुड़ी थी। सर्वोच्च न्यायालय के इंद्रा साहनी फैसले में भी पिछड़े वर्गों की सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व के संवैधानिक संदर्भ पर विस्तार से विचार किया गया।
इसलिए आज आवश्यकता आरक्षण को खत्म करने या आंख मूंदकर बढ़ाने की बहस से ज्यादा विश्वसनीय आंकड़ों, पारदर्शी समीक्षा और वास्तविक प्रतिनिधित्व की है।
भाजपा के सामने अब दो रास्ते हैं। पहला,आरक्षण के मुद्दे को केवल विपक्ष की राजनीति बताकर आगे बढ़ जाना। दूसरा,ओबीसी समेत सभी वर्गों की आशंकाओं को स्वीकार करते हुए स्पष्ट नीति और स्पष्ट राजनीतिक संदेश देना।
क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में मंडल समाप्त नहीं हुआ है। उसने अपना रूप बदला है। पहले सवाल था कि पिछड़ों को आरक्षण मिलेगा या नहीं। अब सवाल है कि पिछड़ों की वास्तविक हिस्सेदारी कितनी है, उसमें किस जाति की कितनी भागीदारी है और सत्ता तथा संस्थानों में उनका प्रतिनिधित्व कितना है।
भाजपा के लिए खतरा आरक्षण विरोधी आंदोलन नहीं, बल्कि आरक्षण पर अस्पष्टता से पैदा होने वाला भरोसे का संकट है। यदि ओबीसी मतदाता के मन में यह धारणा मजबूत होती है कि उसके संवैधानिक अधिकारों पर सवाल उठने पर भाजपा स्पष्ट रूप से उसके साथ खड़ी नहीं है, तो समाजवादी पार्टी के लिए दरवाजा खुल सकता है।
और राजनीति में दरवाजे कभी अकेले नहीं खुलते,उन्हें खोलने के लिए असंतोष, नेतृत्व और सही समय तीनों का एक साथ आना जरूरी होता है।
2027 की लड़ाई में आरक्षण शायद अकेला मुद्दा न हो, लेकिन यह तय है कि ओबीसी के मन में उठ रहे सवालों का जवाब दिए बिना उत्तर प्रदेश की सत्ता का सामाजिक गणित पूरा नहीं होगा।


