– याचिका में 2030 तक कार्यकाल बढ़ाने वाली अधिसूचना रद्द करने की मांग
– नए चुनाव और चेयरमैन पद पर कार्यकाल सीमा तय करने की भी मांग
नई दिल्ली। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के चेयरमैन वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में अप्रैल 2025 में जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसमें मनन कुमार मिश्रा का कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक बताया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि बीसीआई के नियमों के तहत चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित है।
याचिका में इस पांच वर्ष के कार्यकाल को नियमों के विपरीत बताते हुए संबंधित गजट अधिसूचना को अधिकारातीत (अल्ट्रा वायर्स) घोषित कर रद्द करने की मांग की गई है।
याचिका का मुख्य आधार बीसीआई नियम 12(2) है। इसमें चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के कार्यकाल को दो वर्ष या बीसीआई की सदस्यता समाप्त होने तक, इनमें से जो पहले हो, निर्धारित किए जाने का हवाला दिया गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि किसी प्रशासनिक अधिसूचना के जरिए नियमों में निर्धारित दो वर्ष की अवधि को बढ़ाकर पांच वर्ष नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक के कार्यकाल वाली अधिसूचना को चुनौती दी गई है।
याचिका में मनन कुमार मिश्रा के लंबे समय से बीसीआई अध्यक्ष पद पर बने रहने का भी उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार, वह पहली बार 2012 में बीसीआई चेयरमैन बने थे। वर्ष 2014 में कुछ समय के लिए पद से हटने के बाद वह नवंबर 2014 में दोबारा चेयरमैन बने और तब से पद पर बने हुए हैं।
मार्च 2025 में उन्हें फिर निर्विरोध चेयरमैन चुना गया। याचिका में इसे उनका सातवां लगातार कार्यकाल बताया गया है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मनन कुमार मिश्रा और बीसीआई के वाइस चेयरमैन को पद से हटाने तथा नए चुनाव निर्धारित समय सीमा के भीतर कराने का निर्देश देने की मांग की है।
याचिका में चुनाव प्रक्रिया को स्वतंत्र निगरानी में कराने की मांग भी रखी गई है, ताकि बीसीआई के शीर्ष पदों पर नेतृत्व में बदलाव और पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
याचिका में केवल मौजूदा चेयरमैन के कार्यकाल को चुनौती नहीं दी गई है, बल्कि बीसीआई के शीर्ष पदों पर लंबे समय तक एक ही व्यक्ति के बने रहने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिका में मांग की गई है कि- चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के कार्यकाल की स्पष्ट सीमा तय हो,एक व्यक्ति के लिए कुल कार्यकाल की अधिकतम सीमा निर्धारित की जाए- कार्यकाल पूरा होने के बाद कूलिंग-ऑफ अवधि रखी जाए- अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों को नेतृत्व का अवसर देने के लिए रोटेशन प्रणाली लागू की जाए।- कार्यकाल सीमा से बचने के लिए कार्यवाहक, अंतरिम या अन्य नामों से पद पर बने रहने की गुंजाइश खत्म की जाए।
याचिका में बीसीआई की क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व व्यवस्था पर भी सवाल उठाया गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, याचिका में कहा गया है कि पिछले 30 वर्षों में 28 राज्यों में से 20 राज्यों के प्रतिनिधियों को बीसीआई के चेयरमैन पद पर नेतृत्व का अवसर नहीं मिला।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि बीसीआई पूरे देश के अधिवक्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली राष्ट्रीय संस्था है, इसलिए उसके सर्वोच्च पद पर नेतृत्व का अवसर अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों को मिलना चाहिए।
याचिका में स्पष्ट किया गया है कि चुनौती किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत योग्यता या राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि लंबे समय तक संस्थागत सत्ता के केंद्रीकरण, कार्यकाल की स्पष्ट सीमा के अभाव और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को लेकर है।
याचिका का जोर इस बात पर है कि चुनाव होने मात्र से लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावी नहीं हो जाती, यदि वही व्यक्ति लगातार महत्वपूर्ण पदों पर बने रहें। इसलिए बीसीआई के शीर्ष पदों पर नेतृत्व में नियमित बदलाव और व्यापक क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के लिए स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है।
एक अन्य याचिका में मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल के साथ-साथ बीसीआई के वित्त, लॉ कॉलेज, ऑल इंडिया बार परीक्षा से जुड़े प्राप्तियों, ट्रस्ट की वित्तीय व्यवस्था और अन्य वित्तीय लेनदेन के स्वतंत्र ऑडिट की मांग भी की गई है।
याचिकाकर्ता ने इसके लिए स्वतंत्र समिति गठित करने का सुझाव दिया है, जिसमें पूर्व सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश के साथ वित्तीय और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है।


