नई दिल्ली। वंदे मातरम् को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर तीखा हमला बोला है। संजय सिंह ने सोशल मीडिया पोस्ट में प्रधानमंत्री को चुनौती देते हुए कहा कि यदि मोदी बिना “टेलीप्रॉम्प्टर” के पूरा वंदे मातरम् गा दें तो वह माला पहनाकर उनका अभिनंदन करेंगे। उन्होंने भाजपा से स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रवादी प्रतीकों से जुड़े अपने इतिहास पर भी कई सवाल पूछे हैं।
संजय सिंह ने अपने बयान में भाजपा से कथित तौर पर उसके “चार पुरखों” के नाम बताने को कहा, जिन्होंने वंदे मातरम् का नारा लगाकर अंग्रेजों के खिलाफ जेल की सजा काटी हो। इसके साथ ही उन्होंने भाजपा और आरएसएस के इतिहास से जुड़े कई विवादित राजनीतिक प्रश्न उठाए।
उन्होंने तत्कालीन हिंदू महासभा नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिका पर सवाल उठाते हुए पूछा कि उन्होंने तत्कालीन बंगाल के गवर्नर को पत्र क्यों लिखा था। साथ ही उन्होंने यह भी सवाल किया कि मुखर्जी ने मुस्लिम लीग के साथ कुछ राज्यों में सरकार बनाने का निर्णय क्यों लिया था।
संजय सिंह ने भाजपा के वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और जसवंत सिंह द्वारा मोहम्मद अली जिन्ना को लेकर की गई टिप्पणियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने पूछा कि दोनों नेताओं ने जिन्ना की प्रशंसा क्यों की थी।
आरएसएस को लेकर भी उन्होंने कई सवाल खड़े किए। संजय सिंह ने दावा किया कि स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक संघ के मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया गया और संघ की शाखाओं में तिरंगा फहराने की परंपरा को लेकर भी सवाल उठाया। इसके साथ ही उन्होंने 28 दिसंबर 1949 के ऑर्गेनाइजर के एक अंक में राष्ट्रगान को लेकर प्रकाशित कथित टिप्पणी का भी उल्लेख किया और उसका कारण पूछा।
वंदे मातरम् को लेकर मौजूदा राजनीतिक बहस के बीच संजय सिंह का बयान ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार की ओर से इस राष्ट्रीय गीत की ऐतिहासिक भूमिका और इसके 150 वर्ष पूरे होने को लेकर विशेष कार्यक्रमों पर जोर दिया जा रहा है। राज्यसभा की कार्यवाही में भी वंदे मातरम् के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान और राष्ट्रीय गीत के रूप में इसके महत्व पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है।
वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा रहा है। इसे 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने राष्ट्रीय गीत के रूप में समान सम्मान दिए जाने की व्यवस्था स्वीकार की थी। राष्ट्रीय गीत की पहली दो पंक्तियों को सार्वजनिक रूप से अपनाने के पीछे उस समय धार्मिक और राजनीतिक संवेदनशीलताओं को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई थी।
संजय सिंह के बयान ने इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को मौजूदा राजनीति से जोड़ दिया है। उनका तर्क है कि राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों पर राजनीतिक दावा करने से पहले सभी राजनीतिक संगठनों को अपने इतिहास का भी सामना करना चाहिए।


