– लोकतंत्र में असहमति का जवाब बंदूक नहीं, संवाद होना चाहिए
शरद कटियार
बिहार में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और फायरिंग का मामला अब गंभीर बहस का विषय बन गया है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में स्वीकार किया है कि प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी ने एके-47 से चार राउंड हवा में फायर किए। सरकार का कहना है कि इन गोलियों से कोई व्यक्ति घायल नहीं हुआ। फायरिंग करने वाले सिपाही को निलंबित किए जाने की जानकारी भी अदालत को दी गई है।
सरकार का यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं होते। असली सवाल यह है कि छात्रों के प्रदर्शन को नियंत्रित करने की स्थिति में एके-47 से फायरिंग की नौबत क्यों आई? क्या उस समय पुलिसकर्मी के सामने तत्काल और गंभीर खतरा था? क्या फायरिंग करना निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप था? क्या मौके पर मौजूद वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी थी? इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच के जरिए सामने आना चाहिए।
किसी गोली का किसी व्यक्ति को न लगना निश्चित रूप से राहत की बात है, लेकिन भीड़ के बीच आधुनिक हथियार से गोली चलाना अपने आप में गंभीर घटना है। हवा में चलाई गई गोली भी सुरक्षित नहीं मानी जा सकती, क्योंकि उसके गिरने की दिशा और संभावित परिणाम का अनुमान हमेशा नहीं लगाया जा सकता। इसलिए फायरिंग की परिस्थितियों, पुलिसकर्मी की स्थिति और उस समय उपलब्ध अन्य विकल्पों की जांच जरूरी है।
यहां पुलिसकर्मी के पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यदि वह वास्तव में भीड़ के बीच घिर गया था और उसकी जान को तत्काल खतरा महसूस हुआ, तो उसकी सुरक्षा भी राज्य की जिम्मेदारी है। पुलिसकर्मियों को कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है और भीड़ नियंत्रण आसान जिम्मेदारी नहीं है। लेकिन इसी वजह से यह जानना और भी जरूरी हो जाता है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई और उसे नियंत्रित करने की जिम्मेदारी किस स्तर पर थी।
सिर्फ एक सिपाही को निलंबित कर देना पूरे प्रकरण की जवाबदेही तय नहीं करता। जांच में यह भी सामने आना चाहिए कि मौके पर पुलिस बल की तैनाती कैसी थी, हथियार के इस्तेमाल की अनुमति किस स्तर पर थी, फायरिंग से पहले क्या परिस्थितियां बनीं और वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए।
बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एके-47 को प्लाटून स्तर पर इस्तेमाल होने वाला हथियार बताया है। यदि यह हथियार निर्धारित पुलिस व्यवस्था का हिस्सा था तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि प्रदर्शन स्थल पर उसकी तैनाती और इस्तेमाल के लिए क्या मानक संचालन प्रक्रिया लागू थी। कानून-व्यवस्था की ड्यूटी में हथियार रखना अलग बात है और भीड़ के बीच उसका इस्तेमाल करना अलग।
छात्रों के प्रदर्शन का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में छात्र और युवा अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर सकते हैं। सरकार उनकी हर मांग स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध की आवाज सुनना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है। यदि प्रदर्शन हिंसक होता है तो पुलिस को कानून के अनुसार कार्रवाई करनी ही होगी, लेकिन बल प्रयोग आवश्यक, अनुपातिक और नियंत्रित होना चाहिए।
दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिस पर हमला करना या हिंसा का सहारा लेना किसी भी आंदोलन को कमजोर करता है। आंदोलन की ताकत उसके मुद्दे और शांतिपूर्ण तरीके में होती है, हिंसा में नहीं।
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी है कि सरकार और पुलिस कार्रवाई पर उठ रहे सवालों का जवाब तथ्यों के साथ दें। यदि सिपाही ने अपनी जान बचाने के लिए मजबूरी में हवा में गोली चलाई तो जांच में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए। यदि प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। और यदि वरिष्ठ स्तर पर कोई चूक हुई तो केवल निचले स्तर के कर्मचारी पर कार्रवाई करके मामला समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।
आज बिहार की घटना एक बड़े सवाल के सामने खड़ी है—क्या पुलिस और जनता के बीच संवाद की व्यवस्था इतनी मजबूत है कि प्रदर्शन फायरिंग तक पहुंचने से पहले ही स्थिति संभाली जा सके?
सरकार को चाहिए कि छात्र आंदोलनों और कानून-व्यवस्था से जुड़े संवेदनशील मामलों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाए। पुलिसकर्मियों को भीड़ नियंत्रण, संवाद और गैर-घातक तरीकों के इस्तेमाल का पर्याप्त प्रशिक्षण मिले। वहीं प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान पहले से तय हो।
एके-47 से चली चार गोलियां किसी व्यक्ति को घायल न कर पाई हों, लेकिन उन्होंने व्यवस्था के सामने कई सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं,हथियार क्यों निकला, फायर क्यों हुआ, आदेश किसका था और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए क्या बदलेगा?
लोकतंत्र की ताकत बंदूक की नली में नहीं, नागरिक के भरोसे में होती है। सरकार की वास्तविक मजबूती इस बात से तय होती है कि वह असहमति को कितनी संवेदनशीलता से सुनती है और कानून-व्यवस्था को कितनी जिम्मेदारी से संभालती है।


