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Tuesday, August 18, 2026

शादी हुई डिजिटल

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(एक सामाजिक व्यंग्य)

डॉ. विजय गर्ग

एक समय था जब शादी घर-परिवार, रिश्तेदारों, पड़ोसियों और दोस्तों का उत्सव हुआ करती थी। घर में कई दिनों पहले से चहल-पहल शुरू हो जाती थी। रिश्तेदार आते थे, आंगन सजता था, गीत गाए जाते थे और शादी के हर छोटे-बड़े काम में लोग मिल-जुलकर भाग लेते थे। शादी केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन मानी जाती थी।

लेकिन अब जमाना बदल गया है। शादी का कार्ड डाक से नहीं, व्हाट्सऐप पर आता है। रिश्तेदारों को बुलाने के लिए फोन करने की जगह एक सुंदर-सा डिजिटल निमंत्रण भेज दिया जाता है। उसमें दूल्हा-दुल्हन की तस्वीरें, शादी की तारीख, समय, स्थान और कभी-कभी प्रेम कहानी का छोटा-सा वीडियो भी शामिल होता है। निमंत्रण देखकर लगता है कि विवाह समारोह कम और किसी नए वेब-सीरीज का ट्रेलर ज्यादा है।

अब शादी से पहले प्री-वेडिंग शूट होता है। दूल्हा-दुल्हन किसी पार्क, महल, पहाड़ या समुद्र के किनारे अलग-अलग मुद्राओं में तस्वीरें खिंचवाते हैं। कभी दोनों कैमरे की ओर देखते हैं, कभी एक-दूसरे की ओर। फोटोग्राफर कहता है—“थोड़ा और रोमांटिक पोज दीजिए।” बेचारे दूल्हा-दुल्हन सोचते होंगे कि शादी करनी है या अभिनय की परीक्षा देनी है!

पहले बारात निकलती थी तो बैंड-बाजा बजता था। अब बारात के साथ कैमरे, ड्रोन और मोबाइल फोन भी चलते हैं। बारात में शामिल लोगों में से कई नाचने से ज्यादा वीडियो बनाने में व्यस्त दिखाई देते हैं। किसी के हाथ में मोबाइल है, किसी के हाथ में सेल्फी स्टिक और किसी के पास लाइव स्ट्रीमिंग की जिम्मेदारी।

दूल्हे की घोड़ी से ज्यादा महत्वपूर्ण अब उसका एंट्री वीडियो हो गया है। दूल्हा किस रास्ते से आया, कितने कैमरों ने उसे रिकॉर्ड किया और उसके प्रवेश पर कौन-सा संगीत बजा—इन सब पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यदि एंट्री का वीडियो वायरल नहीं हुआ तो मानो शादी का एक महत्वपूर्ण अध्याय अधूरा रह गया।

दुल्हन के लिए भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। पहले दुल्हन के श्रृंगार की प्रशंसा घर की महिलाएँ और रिश्तेदार करते थे। अब कैमरा हर कोण से उसका निरीक्षण करता है। मेकअप, कपड़े, आभूषण और हेयरस्टाइल सब कुछ सोशल मीडिया के योग्य होना चाहिए।

फिर आता है जयमाला का समय। पहले वर-वधू एक-दूसरे को माला पहनाते थे और परिवार खुशी मनाता था। अब जयमाला भी एक सिनेमाई दृश्य बन चुकी है। फूलों की वर्षा, विशेष रोशनी, धुआँ, संगीत और कई कैमरे—सब कुछ एक साथ। कभी-कभी ऐसा लगता है कि विवाह मंडप नहीं, फिल्म का सेट लगा हुआ है।

फेरे शुरू होते हैं तो मोबाइल फोन फिर सक्रिय हो जाते हैं। पंडित जी मंत्र पढ़ रहे हैं और दूसरी तरफ रिश्तेदार कैमरा चला रहे हैं। कोई फोटो खींच रहा है, कोई वीडियो बना रहा है और कोई सोशल मीडिया पर स्टोरी डाल रहा है।

पंडित जी शायद मन ही मन सोचते होंगे—“लोग विवाह संस्कार पर ध्यान दें या मोबाइल की बैटरी पर?”

अब शादी में एक नया प्रश्न भी पैदा हो गया है—“फोटो अच्छी आई या नहीं?”
अगर भोजन अच्छा था, रिश्तेदार खुश थे और समारोह शांतिपूर्ण ढंग से हो गया, तो यह सब बाद की बातें हैं। सबसे पहले देखा जाएगा कि तस्वीरें कैसी आईं।

दूल्हा-दुल्हन की शादी की तस्वीरें पोस्ट होती हैं। फिर बधाइयों का सिलसिला शुरू होता है।

कई लोग ऐसे भी होते हैं जिन्होंने दूल्हा-दुल्हन को कभी देखा तक नहीं, लेकिन फोटो पर टिप्पणी करना उनका सामाजिक कर्तव्य बन जाता है।

कुछ लोग शादी में उपस्थित नहीं हो पाते, लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से पूरा समारोह देख लेते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि वे शादी में शामिल हो गए। दूसरी ओर, जो लोग वास्तव में शादी में मौजूद होते हैं, वे भी कभी-कभी मोबाइल स्क्रीन के माध्यम से ही समारोह देखते हैं।

यह डिजिटल युग का बड़ा विरोधाभास है—लोग कार्यक्रम में उपस्थित होते हैं, लेकिन उनकी नजर कार्यक्रम पर नहीं, स्क्रीन पर होती है।

पहले शादी में भोजन की चर्चा होती थी—कितनी अच्छी मिठाई बनी, सब्जियाँ कैसी थीं, पूरियाँ गर्म थीं या नहीं। अब चर्चा होती है कि खाने की फोटो इंस्टाग्राम पर कैसी लगेगी। मिठाई खाने से पहले उसकी तस्वीर लेना आवश्यक है।

कई बार तो भोजन से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका फूड फोटोग्राफी एंगल हो जाता है।

शादी के बाद भी डिजिटल संसार पीछा नहीं छोड़ता। हनीमून की तस्वीरें, नई गृहस्थी की तस्वीरें, पहली रसोई की तस्वीरें, पहली यात्रा की तस्वीरें—हर घटना डिजिटल रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाती है।

ऐसा लगता है कि आजकल जीवन जीने से पहले यह सोचना पड़ता है कि “इसे पोस्ट कैसे करेंगे?”

पहले लोग शादी की यादें मन में रखते थे। अब यादें मोबाइल की गैलरी में रहती हैं। पहले रिश्तेदार कहते थे—“तुम शादी में आए थे, बहुत अच्छा लगा।” अब कहते हैं—“तुमने हमारी पोस्ट लाइक क्यों नहीं की?”

रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे डिजिटल प्रतिक्रियाओं में बदलती जा रही है। एक “लाइक”, एक “हार्ट” और एक “कमेंट” मानो रिश्ते की नई मुद्रा बन गए हैं।

लेकिन तकनीक को दोष देना भी उचित नहीं होगा। डिजिटल माध्यमों ने शादी को कई सुविधाएँ भी दी हैं। दूर रहने वाले रिश्तेदार समारोह देख सकते हैं। निमंत्रण आसानी से भेजा जा सकता है। तस्वीरें और वीडियो सुरक्षित रखे जा सकते हैं। परिवार के महत्वपूर्ण क्षण दूर बैठे लोग भी देख सकते हैं।

समस्या तकनीक में नहीं, तकनीक के अतिरेक में है।

यदि मोबाइल शादी की यादों को संजोने का माध्यम है, तो वह उपयोगी है। लेकिन यदि मोबाइल के कारण हम शादी का आनंद लेना ही भूल जाएँ, तो समस्या है।

शादी में कैमरा होना गलत नहीं है, लेकिन कैमरा रिश्तों से बड़ा नहीं होना चाहिए। सोशल मीडिया पर तस्वीर डालना गलत नहीं है, लेकिन तस्वीर के लिए भावनाओं का अभिनय करना ठीक नहीं। डिजिटल निमंत्रण सुविधाजनक है, लेकिन कभी-कभी किसी प्रियजन को फोन करके व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करना रिश्ते को अधिक गर्माहट देता है।

आज हमें यह तय करना होगा कि हम शादी को जीना चाहते हैं या केवल रिकॉर्ड करना चाहते हैं।

क्योंकि शादी कोई सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है। यह जीवन का एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इसमें केवल दो लोगों की तस्वीरें नहीं, दो परिवारों की भावनाएँ जुड़ी होती हैं। इसमें केवल सजावट और कैमरा एंगल नहीं, विश्वास, जिम्मेदारी, सहयोग और साथ निभाने का संकल्प भी होता है।

डिजिटल युग में शादी डिजिटल हो सकती है, निमंत्रण डिजिटल हो सकता है, तस्वीरें डिजिटल हो सकती हैं और यादें भी डिजिटल रूप में सुरक्षित हो सकती हैं—लेकिन रिश्ते डिजिटल नहीं होने चाहिए।

सात फेरे कैमरे के सामने लिए जा सकते हैं, लेकिन सात वचनों को निभाने के लिए कैमरे की नहीं, चरित्र की जरूरत होती है।

शादी का वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच सकता है, लेकिन विवाह की वास्तविक सफलता केवल दो लोगों के बीच समझ, सम्मान और विश्वास से तय होती है।

इसलिए अगली बार किसी शादी में जाएँ तो कुछ तस्वीरें जरूर खींचिए, कुछ यादें जरूर संजोइए और चाहें तो सोशल मीडिया पर साझा भी कीजिए। लेकिन बीच-बीच में मोबाइल नीचे रखकर आसपास देखना न भूलिए।

हो सकता है वहाँ कोई बुजुर्ग आपको आशीर्वाद देने के लिए बैठा हो, कोई बच्चा आपके साथ खेलना चाहता हो, कोई पुराना रिश्तेदार आपसे दो बातें करना चाहता हो और कोई मित्र केवल आपके साथ बैठकर हँसना चाहता हो।

क्योंकि शादी डिजिटल हो सकती है,
लेकिन खुशी अब भी असली ही अच्छी लगती है।

और रिश्ते?

वे आज भी वाई-फाई से नहीं, दिल से कनेक्ट होते हैं।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्राचार्य, शिक्षाविद् एवं शिक्षा स्तंभकार
प्रख्यात शिक्षाविद् एवं अकादमिक संपादक, ऑनलाइन पत्रिका डब्ल्यू एन बी
स्ट्रीट कौर, चंद, एमएचआर, मलोट, पंजाब–152107

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