– वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक सुविधा
– न्यायिक प्रक्रिया बाधित करने पर 6.70 लाख का जुर्माना
– रजिस्ट्रार जनरल को सख्त कार्रवाई के निर्देश
प्रयागराज।इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) के जरिए अदालत में पेश होना किसी भी वादी या वकील का मौलिक अधिकार नहीं है। जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की बेंच ने कहा कि वीसी केवल न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने और सुविधा का एक माध्यम है, जिसकी अनुमति देना पूरी तरह से अदालत के विवेक पर निर्भर है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अदालत किसी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश देती है, तो दूरी या लॉजिस्टिक समस्याओं का अनुचित बहाना बनाकर उससे बचा नहीं जा सकता।
अदालत ने इस मामले में वादी द्वारा न्यायिक कार्य और प्रशासन में बाधा डालने पर सख्त रुख अपनाया। याचिकाकर्ता ने न केवल वीसी को अपना मौलिक अधिकार बताकर व्यक्तिगत रूप से पेश होने से इनकार किया, बल्कि प्रशासन को उलझाने के लिए चीफ जस्टिस सचिवालय, सर्वर लॉग्स और अदालती रोस्टर जैसी आंतरिक कार्यप्रणाली से जुड़ी 24 भ्रामक आरटीआई अर्जियां भी दाखिल कर दीं। अदालत ने चिंता जताते हुए टिप्पणी की कि आजकल ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहां लोग अदालत की मर्यादा तोड़कर न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश करते हैं।
अधिकारियों का समय बर्बाद करने, भ्रामक अर्जियां लगाने और न्याय प्रशासन में अड़चन डालने के चलते हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर कुल ₹6,70,000 का भारी जुर्माना लगाया है। अदालत ने आदेश दिया है कि वादी को यह राशि चार सप्ताह के भीतर ‘हाई कोर्ट लीगल सर्विस कमेटी’ के खाते में जमा करनी होगी। इसके साथ ही अदालत ने अधिकारियों के लिए यह सख्त निर्देश जारी किया है कि यदि तय समय-सीमा के भीतर जुर्माने की राशि नहीं चुकाई जाती है, तो रजिस्ट्रार जनरल इस मामले में तत्काल और उचित कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।


