अंकुश गौरव सक्सेना
लखनऊ के एक कोचिंग संस्थान में लगी भीषण आग ने केवल एक इमारत को नहीं जलाया, बल्कि उन तमाम दावों की भी परतें उधेड़ दीं जो वर्षों से सुरक्षा, व्यवस्था और निगरानी के नाम पर किए जाते रहे हैं। इस दर्दनाक हादसे में कई परिवारों ने अपने बच्चों को खो दिया। वे बच्चे, जिन्हें माता-पिता ने सपनों के साथ कोचिंग भेजा था, वापस घर नहीं लौट सके। यह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता का प्रतीक है।
देश में शिक्षा का बाजार तेजी से बढ़ा है। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक कोचिंग संस्थानों की ऊंची इमारतें खड़ी हो गई हैं। लाखों विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इन संस्थानों पर निर्भर हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन इमारतों की सुरक्षा भी उसी गति से बढ़ी है, जिस गति से इनका कारोबार बढ़ा है?
हादसे के बाद हर बार की तरह प्रशासन सक्रिय हुआ। जांच के आदेश दिए गए, जिम्मेदारों की तलाश शुरू हुई और सुरक्षा मानकों की समीक्षा की बातें होने लगीं। लेकिन सच्चाई यह है कि यदि सुरक्षा मानकों का पालन पहले से किया गया होता तो शायद इतनी बड़ी जनहानि नहीं होती। हर त्रासदी के बाद कार्रवाई करना आसान है, लेकिन त्रासदी को रोकना ही प्रशासन की असली सफलता होती है।
आज प्रदेश और देश के हजारों कोचिंग संस्थान बहुमंजिला इमारतों में संचालित हो रहे हैं। कई जगह संकरी सीढ़ियां हैं, कई भवनों में पर्याप्त आपातकालीन निकास नहीं हैं, अनेक स्थानों पर अग्निशमन उपकरण केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। कहीं फायर एनओसी वर्षों पुरानी है तो कहीं भवन की संरचनात्मक सुरक्षा की नियमित जांच ही नहीं होती। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर बच्चों की सुरक्षा किस भरोसे छोड़ी गई है?
एक और गंभीर समस्या भीड़भाड़ वाली कक्षाओं की है। प्रतियोगिता की दौड़ में कई संस्थान अपनी क्षमता से कहीं अधिक छात्रों को प्रवेश दे देते हैं। सीमित स्थान, खराब वेंटिलेशन, अपर्याप्त निकासी मार्ग और अत्यधिक भीड़ किसी भी आपात स्थिति को भयावह बना सकती है। आग, शॉर्ट सर्किट, भगदड़ या भूकंप जैसी परिस्थितियों में ऐसे भवन मौत के जाल में बदल सकते हैं।
इस पूरे मामले में अभिभावकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अक्सर प्रवेश के समय परिणाम, चयन प्रतिशत और संस्थान की प्रसिद्धि को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि सुरक्षा संबंधी पहलुओं पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। किसी भी संस्थान में बच्चे का प्रवेश कराने से पहले यह देखना आवश्यक है कि वहां फायर सेफ्टी की व्यवस्था कैसी है, आपातकालीन निकास मार्ग उपलब्ध हैं या नहीं, भवन सुरक्षित है या नहीं और छात्रों की संख्या क्षमता के अनुरूप है या नहीं।
लखनऊ की घटना के बाद प्रदेश सरकार ने सभी कोचिंग संस्थानों की जांच के निर्देश दिए हैं। यह स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसे केवल कुछ दिनों का अभियान बनाकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। नियमित सुरक्षा ऑडिट, फायर ड्रिल, भवनों की संरचनात्मक जांच और नियमों के उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई को स्थायी व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा।
शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चों को सफल बनाना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित वातावरण देना भी है। किसी संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके परिणाम नहीं, बल्कि वहां पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा होती है। यदि एक छात्र भी सुरक्षा व्यवस्था की कमी के कारण अपनी जान गंवाता है, तो यह पूरे तंत्र की असफलता मानी जानी चाहिए।


