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Wednesday, September 9, 2026

फर्रुखाबाद में माफिया पर शिकंजा ढीला,जीरो टॉलरेंस की थमी धार से सरकार भी कटघरे मे पहुंची

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– पैरोकारी की रफ्तार धीमी , कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मी अलग-थलग पडे
– पुलिस और न्यायिक तंत्र के रिश्तों में खटास ने बढ़ाई मुश्किलें

फर्रुखाबाद। माफिया और गैंगस्टर के खिलाफ प्रदेश सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को लेकर फर्रुखाबाद में अब दबंगों को खासी राहत है, मुक़दमे छूटने लगे, कुर्क संपत्तियां बापस होना तय हो रहा। कभी अपराधियों की संपत्तियों पर लगातार कुर्की की कार्रवाई, गैंगस्टर एक्ट के मुकदमों में तेज पैरोकारी और अपराधी नेटवर्क की आर्थिक कमर तोड़ने की मुहिम दिखाई देती थी, लेकिन अब इसी अभियान की निरंतरता और प्रभावशीलता नगन्य है, और बड़े अपराधियों को उच्च न्यायलय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक जाने का पूरा अवसर है।

आंकडे देखें तो 2025 के बाद माफिया और गैंगस्टर मामलों में कार्रवाई की रफ्तार लगातार कमजोर पड़ी, मुकदमों की पैरोकारी में अपेक्षित तेजी नहीं रही और अपराधियों के खिलाफ मोर्चा लेने वाले पुलिसकर्मियों को भी पर्याप्त संस्थागत समर्थन नहीं मिला। हालांकि सरकारी रिकॉर्ड में 2025 और 2026 के दौरान कई संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई की खानापूर्ति सामने आई है, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार, निरंतरता और न्यायालय में उसके परिणाम को लेकर निराशा ही रही ।
व्यवस्था से जुड़े लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि पुलिस और न्यायिक तंत्र के बीच बढ़ी खटास ने माफिया-गैंगस्टर के मामलों को और पेचीदा बना दिया है। यदि विवेचना करने वाली पुलिस और अदालत में मुकदमे की प्रभावी पैरोकारी करने वाले तंत्र के बीच बेहतर समन्वय न हो तो उसका सीधा असर अभियोजन की मजबूती पर पड़ सकता है, और यहाँ ऐसा ही हुआ, पुलिस के मददगार लोगों वादी और गवाहों को ही जिल्लत उठानी पड़ी ।

ज्ञातव्य हो कि माफिया तंत्र के खिलाफ कार्रवाई केवल गिरफ्तारी या संपत्ति कुर्क करने तक सीमित नहीं होती। पुलिस की विवेचना, साक्ष्य का संकलन, गवाहों की सुरक्षा, अभियोजन की तैयारी और अदालत में प्रभावी पैरोकारी इन सभी कड़ियों के मजबूत रहने पर ही कार्रवाई अपने मुकाम तक पहुंचती है।
जनपद मे लम्बे समय से सवाल पैदा होता रहा है कि क्या इन सभी कड़ियों के बीच वह समन्वय कायम है, जो जीरो टॉलरेंस नीति को जमीन पर प्रभावी बनाने के लिए जरूरी है?
माफिया के खिलाफ पूर्व में हुई कार्रवाई का पैमाना कितना बड़ा रहा है, इसका अंदाजा अनुपम दुबे, और अन्य मामलों से लगाया जा सकता है। जुलाई 2025 तक उसकी 1 अरब 71 करोड़ 9 लाख 24 हजार 895 रुपये की संपत्ति कुर्क किए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी। उसके खिलाफ 65 मुकदमों का भी उल्लेख किया गया था।
इसके बाद भी कार्रवाई जारी रहने के उदाहरण मिले। अप्रैल 2026 में मैनपुरी के नवीगंज क्षेत्र में अनुपम दुबे की करीब 6 बीघा जमीन, जिसकी कीमत 12 करोड़ 96 लाख 75 हजार रुपये बताई गई, कुर्क की गई।
फरवरी 2026 में गैंगस्टर जुबैर खान के खिलाफ करीब 26 करोड़ 51 लाख 19 हजार 623 रुपये की चल-अचल संपत्ति कुर्क किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। सट्टा माफिया हसनैन के मामले में भी करीब 3 करोड़ 12 लाख 10 हजार रुपये की संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई हुई।
ये आंकड़े बताते हैं कि कार्रवाई के उदाहरण मौजूद हैं। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि कुर्की के बाद मुकदमों का क्या हुआ और अपराधी नेटवर्क के खिलाफ अदालत में सरकार का पक्ष कितना मजबूत रहा।
जनपद में गैंगस्टर के पुराने मामलों में फैसलों की समयसीमा भी व्यवस्था की बड़ी चुनौती सामने रखती है। सितंबर 2025 में एक मामले में दो आरोपियों पर 23 वर्ष बाद आरोप साबित हुए, जबकि दूसरे मामले में आरोपी को 28 वर्ष बाद छह साल की सजा सुनाई गई।

इतने लंबे समय तक मुकदमों का लंबित रहना आश्चर्य पैदा करता है कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया को समयबद्ध और प्रभावी बनाने के लिए क्या पर्याप्त प्रयास हो रहे हैं।
माफिया पर कार्रवाई का सबसे कमजोर हिस्सा तब बना जब पुलिस की मेहनत अदालत तक पहुंचकर प्रभावी परिणाम में नहीं बदली । मुकदमा दर्ज करना, गैंगस्टर लगाना और संपत्ति कुर्क करना शुरुआती कदम हैं,अंतिम कसौटी दोषसिद्धि और अपराधी नेटवर्क का स्थायी विघटन है।
यदि किसी मामले में विवेचना कमजोर पड़ती है, साक्ष्य समय पर नहीं जुटते, गवाहों की निगरानी कमजोर होती है या अभियोजन प्रभावी पैरोकारी नहीं कर पाता, तो अपराधी पक्ष को कानूनी राहत मिलने की संभावना बढ़ जाती है।गौरतलब है पुलिस, प्रशासन और अभियोजन तीनों के बीच बेहतर समन्वय के बिना माफिया के खिलाफ निर्णायक लड़ाई संभव नहीं है।इसके अलावा अनुभव हीन पुलिस टीम भी बहुत कुछ मायने रखती है, ज़ो निरंतर तैनात की गईं।

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