अमृतपुर, फर्रुखाबाद।बाढ़ ने अमृतपुर तहसील के ग्रामीणों की जिंदगी को ऐसा संकट बना दिया है, जहां घर बचाना मुश्किल है और अपनों को अंतिम विदाई देना भी आसान नहीं। गांवों में घुसा पानी आशियाने उजाड़ रहा है। जिनके घर और झोपड़ियां क्षतिग्रस्त हो गईं, वे पन्नी तानकर खुले पानी और बारिश के बीच रात काटने को मजबूर हैं। दूसरी ओर, बाढ़ राहत और व्यवस्थाओं के सरकारी दावों के बीच फखरपुर पुल के किनारे सड़क पर हुआ अंतिम संस्कार व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। चिता के लिए लकड़ी और कंडे तक नाव से पहुंचाने पड़े।मंझा गांव निवासी नन्ही, बलवीर और हनुमत पुत्र श्रीपाल के मकान बाढ़ के पानी से क्षतिग्रस्त हो गए हैं। माधुरी पत्नी रामसेवक की दो झोपड़ियां भी पानी की चपेट में आकर कट गईं। घर उजड़ने के बाद परिवार के सामने सबसे बड़ा संकट सिर छिपाने का है। पन्नी को छत बनाकर गुजर रही जिंदगी इस बात की गवाही दे रही है कि बाढ़ उतरने से पहले ही कई परिवारों के लिए मुसीबत और गहरी हो चुकी है।हालात सिर्फ घरों तक सीमित नहीं हैं। गांवों के रास्ते पानी में डूबे हैं। बाजार, अस्पताल और रोजमर्रा की जरूरतों तक पहुंचना मुश्किल है। पशुओं के लिए चारा जुटाना चुनौती बन गया है। जरूरी सामान नाव के सहारे लाना पड़ रहा है। बाढ़ के बीच नाव ही ग्रामीणों की आवाजाही की सबसे बड़ी उम्मीद है, लेकिन कई जगह नाविक उपलब्ध नहीं होने से संकट और बढ़ गया है।बाढ़ प्रभावित इलाकों की सबसे चिंताजनक तस्वीर यह है कि नाविक के अभाव में महिलाएं और किशोरियां तक खुद नाव चलाकर पानी पार करने को मजबूर हैं। जिस बाढ़ में तेज बहाव और गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल है, उसमें मजबूरी ग्रामीणों को जोखिम उठाने पर विवश कर रही है।इसी बदहाली के बीच एक परिवार पर आई मौत की पीड़ा और बढ़ गई। चारों तरफ पानी भरा होने के कारण शव को अंतिम संस्कार के लिए फखरपुर पुल के किनारे ले जाना पड़ा। चिता के लिए लकड़ी और कंडे भी नाव से लाने पड़े। इसके बाद सड़क किनारे अंतिम संस्कार किया गया।
बाढ़ में फंसे गांवों की उस पीड़ा को सामने रखती है, जहां सामान्य जीवन की बुनियादी व्यवस्थाएं भी पानी के आगे बेबस दिखाई दे रही हैं।ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें तत्काल सुरक्षित स्थान, तिरपाल, भोजन, स्वच्छ पेयजल और पशु चारे की जरूरत है।


