लखनऊ। प्रदेश में लगाए जा रहे स्मार्ट प्रीपेड बिजली मीटरों की रीडिंग को लेकर उपभोक्ताओं में शंका बढ़ती जा रही है। बड़ी संख्या में उपभोक्ता अब टेस्ट मीटर लगवाने के लिए आवेदन कर रहे हैं, लेकिन उनकी शिकायतों पर समय से सुनवाई नहीं हो रही। कई उपभोक्ताओं ने बताया कि आवेदन करने के बाद भी हफ्तों तक विभाग की ओर से कोई जवाब नहीं मिलता।
स्थिति और विवादास्पद तब हो गई जब टेस्ट मीटर लगाने की जिम्मेदारी उन्हीं कंपनियों को सौंप दी गई है, जिन पर स्मार्ट मीटरों में गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं। यानी जिन कंपनियों के मीटरों की सटीकता पर उपभोक्ताओं को भरोसा नहीं है, उन्हें ही अब मीटर जांच का जिम्मा भी दिया जा रहा है।
पावर कॉरपोरेशन सूत्रों के अनुसार, प्रदेश में उपभोक्ताओं के घरों पर पुराने मीटरों को हटाकर स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा रहे हैं। इसके लिए विभाग ने सीधे मीटर नहीं खरीदे, बल्कि निजी कंपनियों को टेंडर के माध्यम से यह काम सौंपा है। इन्हीं कंपनियों को नए कनेक्शन वाले उपभोक्ताओं के यहां भी स्मार्ट मीटर लगाने का आदेश दिया गया है।
जानकारों का कहना है कि पावर कॉरपोरेशन ने टेस्ट मीटर की स्वतंत्र व्यवस्था नहीं की है। सामान्य प्रक्रिया के तहत जब कॉरपोरेशन मीटरों की खरीद करता है तो हर खेप (लॉट) से कुछ मीटरों को एनएबीएल प्रमाणित लैब में जांच के लिए भेजा जाता है। टेस्टिंग के बाद इन्हें प्रमाण पत्र और सील के साथ स्टोर में रखा जाता है ताकि जरूरत पड़ने पर इनका उपयोग ‘टेस्ट मीटर’ के रूप में किया जा सके।
लेकिन स्मार्ट प्रीपेड मीटर के मामले में यह प्रक्रिया अपनाई ही नहीं गई। अब जब उपभोक्ता टेस्ट मीटर लगाने का अनुरोध कर रहे हैं, तो उन्हीं कंपनियों को एक और मीटर लगाने का आदेश जारी किया जा रहा है।
उधर, पुराने मीटरों की तुलना के लिए पावर कॉरपोरेशन ने पहले ही आदेश जारी किए थे कि बदले जा रहे स्मार्ट मीटरों के अनुपात में कम से कम पांच प्रतिशत पुराने मीटर घरों पर लगे रहने दिए जाएं, ताकि उपभोक्ता दोनों की रीडिंग का मिलान कर सकें। हालांकि अब तक इन तुलनात्मक रिपोर्टों को सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे उपभोक्ताओं की शंका और गहराती जा रही है।






