शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में इस समय बाढ़ और बारिश केवल प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रशासनिक तैयारियों और हमारी विकास व्यवस्था की भी परीक्षा बन गई है। गंगा, यमुना, सरयू, घाघरा समेत दस से अधिक नदियों का उफान और 49 जिलों में बारिश का अलर्ट आने वाले दिनों की गंभीर तस्वीर पेश कर रहा है। फर्रुखाबाद में घरों का गंगा में समाना और बलिया में सड़कों पर नाव चलना बताता है कि हालात कितने विकट हैं।
सबसे भयावह तस्वीर नदी किनारे बसे गांवों की है। फर्रुखाबाद के समेचीपुर चितार में कटान से लगातार मकान नदी में समा रहे हैं। जिन घरों को ग्रामीणों ने वर्षों की मेहनत और जमा पूंजी से बनाया, उन्हें अपनी आंखों के सामने नदी की धारा में समाते देखना किसी त्रासदी से कम नहीं। सवाल केवल मकानों के गिरने का नहीं, बल्कि उन परिवारों के भविष्य का है जो अचानक बेघर हो रहे हैं।
बाढ़ हर साल आती है, नदियां हर साल उफनती हैं और कटान हर वर्ष जमीन निगलता है। इसके बावजूद स्थायी समाधान आज भी दूर दिखाई देता है। राहत सामग्री बांटना और नावें चलाना जरूरी है, लेकिन यह संकट का इलाज नहीं, तत्काल मरहम है। जरूरत इस बात की है कि संवेदनशील गांवों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए, कटान प्रभावित परिवारों का समय रहते सुरक्षित पुनर्वास हो और तटबंधों व कटानरोधी कार्यों की निगरानी कागजों के बजाय जमीन पर दिखाई दे।
उन्नाव में सड़क का हिस्सा बहने से दर्जनों गांवों का संपर्क प्रभावित होना भी चेतावनी है। बाढ़ के समय सड़क, पुल, बिजली, दूरसंचार और स्वास्थ्य सेवाएं सबसे महत्वपूर्ण हो जाती हैं। किसी इलाके का संपर्क टूटना केवल आवागमन की समस्या नहीं है; यह मरीजों, बच्चों, किसानों और जरूरतमंद परिवारों के लिए संकट को कई गुना बढ़ा देता है।
मौसम विभाग की चेतावनी को भी महज सूचना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगले 48 घंटे प्रशासन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना, पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करना, दवाओं और पीने के पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा राहत शिविरों में पर्याप्त इंतजाम करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
साथ ही, बाढ़ को केवल सरकारी जिम्मेदारी मानना भी उचित नहीं होगा। ग्रामीणों को भी प्रशासन की चेतावनियों का पालन करना चाहिए और तेज बहाव वाले रास्तों, पुलों तथा जलमग्न सड़कों को पार करने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए। बरेली में बाइक समेत तीन लोगों के नदी में बहने की घटना इस लापरवाही की कीमत की भयावह याद दिलाती है।
उत्तर प्रदेश को अब हर साल बाढ़ आने के बाद राहत बांटने की व्यवस्था से आगे बढ़ना होगा। बाढ़ के बाद राहत से ज्यादा जरूरी बाढ़ से पहले तैयारी है। नदियों के स्वभाव, बदलते जलप्रवाह और लगातार बढ़ते कटान को ध्यान में रखकर दीर्घकालिक नीति बनानी होगी। वरना हर बरस यही तस्वीर दोहराई जाएगी—मकान नदी में समाते रहेंगे, सड़कें टूटती रहेंगी और प्रशासन राहत पहुंचाने में जुटा रहेगा।
यह समय केवल पानी उतरने का इंतजार करने का नहीं, बल्कि अगली बाढ़ से पहले स्थायी समाधान तैयार करने का है।


