नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हिंदू धर्म को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू धर्म केवल पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का तरीका है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या विशेष धार्मिक कर्मकांड करना जरूरी नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी या घर में दीपक जलाकर आस्था व्यक्त करता है, तो वही उसके धर्म को साबित करने के लिए पर्याप्त है।
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान की। सुनवाई में सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामला और दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई। न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने कहा कि हिंदू धर्म को जीवन जीने का तरीका इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें आस्था व्यक्त करने के लिए किसी निश्चित कर्मकांड का पालन अनिवार्य नहीं है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. जी मोहन गोपाल ने अदालत में कहा कि हिंदू धर्म को पहले धार्मिक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया था और बाद में एक फैसले में वेदों को सर्वोच्च मानने वाले व्यक्ति को हिंदू बताया गया। इस पर अदालत ने कहा कि आज हर हिंदू के लिए किसी विशेष धार्मिक पद्धति का पालन करना आवश्यक नहीं माना जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्था ही उसके धर्म का सबसे बड़ा प्रमाण है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अगर हर धार्मिक परंपरा और प्रथा को अदालत में चुनौती दी जाने लगे, तो इससे सभी धर्म प्रभावित होंगे और बड़ी संख्या में याचिकाएं सामने आएंगी।
गौरतलब है कि वर्ष 2018 में सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामला में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर लगी रोक को हटाते हुए उसे असंवैधानिक बताया था। उस फैसले के बाद धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और परंपराओं को लेकर देशभर में व्यापक बहस छिड़ गई थी।


