नई दिल्ली। क्या किसी विवाहित पुरुष के साथ लिव-इन संबंध में रह रही महिला भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (अब भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत समाविष्ट) के तहत दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज करा सकती है? इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर विचार करने का निर्णय लिया है। धारा 498ए के प्रावधानों के अनुसार केवल “पत्नी” ही अपने पति या उसके रिश्तेदारों के विरुद्ध क्रूरता या दहेज उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करा सकती है। चूंकि Hindu Marriage Act, 1955 के तहत एक व्यक्ति एक समय में केवल एक ही वैध विवाह कर सकता है, ऐसे में लिव-इन संबंध में रह रही महिला की कानूनी स्थिति को लेकर बहस तेज हो गई है।
न्यायमूर्ति Sanjay Karol और न्यायमूर्ति N. Kotiswar Singh की पीठ ने डॉक्टर लोकेश बी.एच. की याचिका पर सुनवाई की। लोकेश ने वर्ष 2000 में नवीना से विवाह किया था। आरोप है कि उन्होंने 2010 में तीर्थ नामक महिला से भी विवाह किया, जो विधि अनुसार अवैध है। वर्ष 2016 में तीर्थ ने लोकेश पर दहेज की मांग को लेकर उसे जलाने का प्रयास करने का आरोप लगाया और बाद में घरेलू हिंसा का मामला भी दर्ज कराया।
याचिकाकर्ता लोकेश का कहना है कि तीर्थ के साथ उनका कोई वैध वैवाहिक संबंध नहीं है। उन्होंने इस संबंध में बेंगलुरु की पारिवारिक अदालत में घोषणा वाद दायर किया है, जो अभी लंबित है। साथ ही उनके नियोक्ता ने यह प्रमाणित किया है कि कथित घटना के दिन वह अस्पताल में ड्यूटी पर मौजूद थे। हालांकि Karnataka High Court ने उनके विरुद्ध चल रही कार्यवाही रद्द करने की मांग को खारिज कर दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की जटिलता को देखते हुए केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से सहायता मांगी गई है तथा वरिष्ठ अधिवक्ता नीना नरिमन को न्यायालय मित्र नियुक्त किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय नुली ने तर्क दिया कि धारा 498ए की भाषा स्पष्ट रूप से “पति” और “पत्नी” तक सीमित है, इसलिए इसे लिव-इन संबंधों पर लागू नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब पुरुष पहले से विधिवत विवाहित हो। यदि सर्वोच्च न्यायालय लिव-इन संबंध में महिला को इस धारा के अंतर्गत पत्नी का दर्जा देता है, तो यह भारतीय वैवाहिक कानूनों की पारंपरिक व्याख्या में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है।






