26 C
Lucknow
Tuesday, September 1, 2026

व्यंग्य : चाय का जाति प्रमाणपत्र

Must read

(सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स)

चाय मेरी सबसे बड़ी कमजोरी रही है। चाहे मुझे कितनी भी देर हो रही हों किसी ने कह दिया, कि भाई साहब चाय पीकर जाना फिर समझिए वहां बैठना मेरी विवशता बन जाता है। स्कूल समय से लेकर कॉलेज समय तक चाय की कुछ दुकानें मेरी पहली पसंद हुआ करती थी। यदि घर से बाहर जाता था, तो चाय की टपरी पर बैठ कर कड़क चाय लेकर ही आगे बढ़ता था।
चाय वाले सज्जन भी मेरी पसंद पहचानते थे। कचहरी में चाय की दुकान का मालिक अपने लड़के से कहता था, कि चाय में उबाल अधिक लगा देना। बहरहाल उस दौर में कागज के गिलास नहीं हुआ करते थे, चीनी के कप या कांच के गिलास सभी ग्राहकों के लिए हुआ करते थे। ग्राहकों के चेहरे पर लिखी ग्राहकों की जाति पढ़ने का चलन भी नहीं था। दुकानदार के चेहरे पर लिखी जाति पढ़ने का चलन तो कतई नहीं। सामने चाय पीने के लिए कौन आया है, उसका धर्म क्या है, उसकी जाति क्या है , वह महिला है या पुरुष आदि का कोई विभेद भी नहीं था। कुल्हड़ में चाय का चलन अधिक नहीं था। रेलवे कम्पार्टमेंट में यदा कदा कुल्हड़ में चाय मिल जाती थी, किन्तु चाय वाले की क्या मजाल, जो किसी यात्री की जाति पूछ ले।
बहरहाल अब हम आधुनिक हो गए हैं। सार्वजनिक साहित्यिक, सामाजिक उत्सवों,विवाह समारोहों से लेकर शोकसभाओं तक में न तो कांच के गिलास दिखाई देते हैं और न ही कुल्हड़, वहां भीड़ का अनुमान लगाकर एक बड़े जार में चाय भरकर रख दी जाती है और लोग कागज के गिलास में अपनी मर्जी से चाय लेकर पीने लगते हैं।
चाय की क्वालिटी के आधार पर कीमतें तो अलग अलग होती थी, जैसे जनता चाय, स्पेशल चाय, मलाई मार्का चाय , दूध की मात्रा किसी में कम किसी में ज्यादा, मगर चाय परोसने में कोई भेद ही नहीं किया जाता। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा, कि कांच के गिलास वाली चाय और कागज के गिलास वाली चाय में कोई अंतर होता है। कुल्हड़ की चाय के स्वाद कुछ अंतर होता है। मिट्टी की सौंधी खुशबू स्वाद में चार चाँद लगा देती है, मगर अधिक देर तक चाय की चुस्कियों को गर्म नहीं रहने देती। चाय पीने वालों को को कोई फर्क नहीं पड़ता, अलबत्ता एक कवि महोदय कुल्हड़ वाली चाय को पतिव्रता की संज्ञा दे चुके हैं तथा कांच के गिलास वाली चाय को बेहया, जो किसी के भी होंठो का स्पर्श करती रहती है। सबकी अपनी अपनी सोच, अपनी अपनी अवधारणा।
एक सज्जन जो अपने आप को राष्ट्र का मुखिया होने का प्रबल दावेदार सिद्ध करते हैं, आजकल चाय के संबंध में नए नए शोध निष्कर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। कुल्हड़ की चाय के संबंध में तो कुछ नहीं कहते, किन्तु कांच के गिलास वाली चाय को सवर्ण चाय और कागज के गिलास वाली चाय को दलित चाय की संज्ञा देते हैं। मैं विचार मग्न हूँ। समझ नहीं पा रहा हूँ, कि बरसों से जिस चाय वाले की मैं जाति नहीं जानता, जो मुझे और सभी साथियों को कांच के गिलास में चाय पिलाता रहा। रेलवे में यात्रा करते समय कांच के गिलास में चाय पीता रहा, अब भी बड़े रेस्तरां में कागज के गिलास में चाय पीता हूँ, तो चाय के गिलास से मेरी जाति की पहचान आखिर किस आधार पर होती है। मुझे समझ नहीं आता, कि यह सच्चा निष्कर्ष है या किसी मनोरोग का लक्षण है, जो चाय के स्वाद में भी जहर घोलने जैसा कार्य कर रहा है। (विनायक फीचर्स)

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article