शरद कटियार
कभी सत्ता के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों में गिने जाने वाले यादव परिवार के भीतर से आई एक मौत की खबर ने सिर्फ एक घर को नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मुलायम सिंह यादव के पुत्र प्रतीक यादव अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत के बाद उठ रहे सवाल सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु तक सीमित नहीं हैं। यह कहानी सत्ता, रिश्तों, मानसिक तनाव, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और टूटते पारिवारिक ढांचे की भयावह तस्वीर भी दिखा रही है।
प्रतीक यादव सक्रिय राजनीति से दूर थे। न उन्होंने मंचों से भाषण दिए, न चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाई। लेकिन वह उस परिवार का हिस्सा थे जहां हर सांस राजनीति से टकराती है। जहां निजी जीवन भी सार्वजनिक बहस बन जाता है। जहां रिश्ते भी राजनीतिक समीकरणों में तौले जाते हैं। और शायद यही दबाव धीरे-धीरे एक ऐसे इंसान को भीतर से खत्म करता गया जो बाहर से पूरी तरह फिट और सामान्य दिखाई देता था।
प्रतीक यादव का पुराना सोशल मीडिया पोस्ट अब सिर्फ वायरल कंटेंट नहीं रह गया है। “मेरा परिवार बर्बाद कर दिया गया”, “मेरी मानसिक स्थिति खत्म हो चुकी है” जैसे शब्द किसी राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा नहीं लगते, बल्कि भीतर से टूट चुके व्यक्ति की चीख दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि क्या किसी ने उस चीख को गंभीरता से सुना? या फिर राजनीति की चकाचौंध में सब कुछ सामान्य मान लिया गया?
अपर्णा यादव का भाजपा में जाना, परिवार के भीतर वैचारिक टकराव, सार्वजनिक मंचों पर बदलते रिश्ते और लगातार सोशल मीडिया की निगाहें… यह सब किसी भी व्यक्ति के मानसिक संतुलन पर गहरा असर डाल सकता है। खासकर तब, जब वह व्यक्ति राजनीतिक परिवार का हिस्सा हो लेकिन राजनीति का खिलाड़ी न हो।
सबसे दुखद पहलू यह है कि समाज आज भी मानसिक तनाव और डिप्रेशन को बीमारी नहीं, कमजोरी मानता है। बड़े घरानों में तो इसे और भी ज्यादा छिपाया जाता है। लोग शरीर की फिटनेस देखकर मान लेते हैं कि इंसान पूरी तरह ठीक है। लेकिन मानसिक टूटन जिम में दिखाई नहीं देती। वह अंदर ही अंदर इंसान को खत्म करती रहती है।
राजनीति केवल सत्ता की लड़ाई नहीं रह गई है। अब यह निजी जिंदगी में भी घुस चुकी है। विचारधाराएं परिवारों को बांट रही हैं। सार्वजनिक छवि बचाने की मजबूरी रिश्तों को खोखला कर रही है। सोशल मीडिया हर दर्द को तमाशा बना देता है। और इस पूरी प्रक्रिया में इंसान कहीं पीछे छूट जाता है।
आज प्रतीक यादव नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत एक बड़ा सवाल छोड़ गई है क्या राजनीतिक परिवारों के लोग सच में खुश और सुरक्षित होते हैं? क्या सत्ता का वैभव मानसिक शांति भी देता है? या फिर राजनीति धीरे-धीरे रिश्तों, भावनाओं और इंसानियत को खा जाती है?
यह समय सिर्फ शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी है। क्योंकि अगर समाज और परिवार मानसिक तनाव को समय रहते समझना नहीं सीखेंगे, तो ऐसी दुखद घटनाएं केवल खबर बनकर नहीं रहेंगी, बल्कि आने वाले समय की भयावह सच्चाई बन जाएंगी।


