अपराधी की कोई जाति नहीं होती, जातिवादी सहानुभूति समाज को अंधे गड्ढे में धकेल रही है

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शरद कटियार

देश और समाज के लिए यह सबसे खतरनाक सोच बन चुकी है कि अपराधी की पहचान उसके कर्म से नहीं, बल्कि उसकी जाति से की जाए। यह प्रवृत्ति न केवल न्याय व्यवस्था के लिए विष का काम कर रही है, बल्कि सामाजिक संतुलन, नैतिकता और मानवीय विवेक के लिए भी गंभीर खतरा बन चुकी है।
आज हम उस दौर में खड़े हैं, जहां किसी अपराधी के खिलाफ कानून अपना काम शुरू करे, उससे पहले ही उसका जातीय समूह उसके बचाव में खड़ा हो जाता है। लोग यह तक कहने लगते हैं कि “वह हमारे समाज का है, इसलिए निर्दोष है।” यह विचार समाज के पतन की निशानी है। यह न केवल अपराध को बढ़ावा देता है, बल्कि अपराधियों के हौसले भी बुलंद करता है।
सच्चाई यह है कि अपराधी सबसे पहले अपराध अपने ही समाज, अपने ही रिश्तेदारों और अपने ही समुदाय के लोगों के साथ करता है। वह वहीं से शुरुआत करता है जहां उसे सबसे अधिक विश्वास और सहूलियत मिलती है। यही कारण है कि जब समाज अपराधियों की ढाल बन जाता है, तो सबसे पहले उसी समाज का नुकसान होता है।
जाति देखकर किसी व्यक्ति को निर्दोष या दोषी मान लेना न्याय की आत्मा की हत्या के समान है। अपराध का कोई धर्म नहीं, कोई जाति नहीं, कोई बिरादरी नहीं होती। उसका एक ही परिचय होता है — वह अपराध है। और अपराधी चाहे किसी भी वर्ग, समुदाय या समाज से जुड़ा हो, वह समाज का दुश्मन है।
जब समाज अपने अपराधियों को बचाने में लग जाता है, तो न्याय की धार कुंद पड़ जाती है और अपराधी का साहस दुगुना हो जाता है। यही कारण है कि आज कई जगहों पर अपराध केवल इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि समाज ने उन्हें जातीय संरक्षण देना शुरू कर दिया है।यह याद रखना होगा कि यदि समाज जाति देखकर अपराधियों को समर्थन देता रहा, तो आने वाले समय में हर गांव, हर शहर और हर परिवार अपराध की दलदल में धंसता चला जाएगा। अपराध को किसी जाति, किसी धर्म या किसी वर्ग की आड़ में छिपाना, स्वयं अपने भविष्य को अंधकार में धकेलने जैसा है।अब वक्त आ गया है कि हम यह तय करें कि हम न्याय के साथ हैं या जाति के साथ। क्योंकि जो समाज न्याय से मुंह मोड़ता है, वह धीरे-धीरे अपनी ही बर्बादी की कहानी लिखता है। अपराध को अपराध की तरह देखना ही सभ्य समाज की निशानी है। अगर हम यह नहीं कर सके, तो आने वाली पीढ़ियां हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद करेंगी जिसने अपराधियों को बचाकर न्याय को खत्म कर दिया।

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