प्रयागराज से उठी एक खबर ने प्रदेश के उच्च शिक्षा जगत में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत्यकाम का कार्यकाल पूरा होने से करीब दस महीने पहले इस्तीफा देना सामान्य प्रशासनिक घटना नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब यह घटनाक्रम विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में राज्यपाल एवं कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल की सार्वजनिक नाराजगी के कुछ सप्ताह बाद सामने आया हो।
प्रो. सत्यकाम ने 5 जून 2024 को विश्वविद्यालय के कुलपति का पद संभाला था। अब उनका इस्तीफा स्वीकार कर प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ राज्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अखिलेश कुमार सिंह को अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है। प्रशासनिक दृष्टि से यह व्यवस्था तत्काल कामकाज चलाने के लिए आवश्यक हो सकती है, लेकिन इसके पीछे उठ रहे सवालों का जवाब मिलना भी उतना ही जरूरी है।
17 जुलाई को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में राज्यपाल की ओर से विश्वविद्यालय की व्यवस्थाओं पर नाराजगी जताए जाने की बात सामने आई थी। यह भी बताया गया कि कुलपति को राजभवन बुलाने की बात कही गई थी। इसके बाद कुलपति का इस्तीफा सामने आया तो दोनों घटनाओं को जोड़कर चर्चाएं शुरू हो गईं।
लेकिन यहां पत्रकारिता और संस्थागत विवेक दोनों की कसौटी महत्वपूर्ण है। जब तक प्रो. सत्यकाम स्वयं अपने इस्तीफे का कारण स्पष्ट नहीं करते या राजभवन की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आता, तब तक यह कहना उचित नहीं होगा कि राज्यपाल की टिप्पणी ही इस्तीफे का प्रत्यक्ष कारण थी।
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है,चर्चा और तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना।
किसी विश्वविद्यालय की पहचान केवल उसके दीक्षांत समारोह, भवनों या प्रशासनिक व्यवस्थाओं से नहीं होती। विश्वविद्यालय एक विचार और ज्ञान की संस्था है। वहां कुलपति से लेकर शिक्षक, कर्मचारी और विद्यार्थी तक सभी की भूमिका संस्थान की प्रतिष्ठा से जुड़ी होती है।
यदि किसी विश्वविद्यालय की व्यवस्था में कमियां हैं तो उन्हें दूर करना जरूरी है। कुलपति प्रशासनिक प्रमुख होते हैं और उनसे जवाबदेही की अपेक्षा स्वाभाविक है। लेकिन सुधार की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें संस्था की गरिमा, पद की मर्यादा और संवाद की संस्कृति भी बनी रहे।
राज्यपाल विश्वविद्यालय के कुलाधिपति होते हैं और उनका दायित्व विश्वविद्यालयों की व्यवस्था एवं गुणवत्ता पर नजर रखना भी है। वहीं कुलपति की जिम्मेदारी विश्वविद्यालय को शैक्षणिक और प्रशासनिक रूप से बेहतर दिशा देना है। दोनों संवैधानिक-प्रशासनिक भूमिकाओं के बीच स्वस्थ संवाद किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान के लिए आवश्यक है।
प्रो. सत्यकाम के इस्तीफे का आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है। यही अस्पष्टता इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अटकलों को जन्म दे रही है। यदि इस्तीफा व्यक्तिगत, प्रशासनिक या स्वास्थ्य संबंधी किसी कारण से हुआ है तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर कोई गंभीर मतभेद थे, तो उनकी भी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
किसी कुलपति का कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ना विश्वविद्यालय के लिए महज एक प्रशासनिक बदलाव नहीं होता। इसका असर विश्वविद्यालय के निर्णयों, अकादमिक योजनाओं और प्रशासनिक निरंतरता पर पड़ सकता है।
इस प्रकरण को केवल ‘राज्यपाल बनाम कुलपति’ के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि क्या हमारे विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक जवाबदेही और संस्थागत सम्मान के बीच संतुलन कायम है?
राज्यपाल की नाराजगी हो या कुलपति का इस्तीफा—दोनों घटनाएं इस बात की ओर संकेत करती हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में संवाद और पारदर्शिता को और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है।
प्रो. अखिलेश कुमार सिंह को अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है। अब उम्मीद यही होनी चाहिए कि विश्वविद्यालय का कामकाज प्रभावित न हो और शैक्षणिक गतिविधियां निरंतर चलती रहें। साथ ही, यदि किसी स्तर पर व्यवस्थागत कमियां थीं तो उनका समाधान भी किया जाए।
कुलपति बदलने से विश्वविद्यालय की समस्याएं समाप्त नहीं होतीं। जरूरत है कि समस्याओं की पहचान हो, जिम्मेदारी तय हो और सुधार की ठोस प्रक्रिया आगे बढ़े।
फिलहाल प्रो. सत्यकाम के इस्तीफे की वास्तविक वजह आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं है। इसलिए निष्कर्ष निकालने के बजाय तथ्यों की प्रतीक्षा करना ही उचित होगा। लेकिन यह प्रकरण इतना जरूर सिखाता है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में पद की गरिमा से ज्यादा महत्वपूर्ण संस्थान की गरिमा होती है—और उसे बनाए रखने की जिम्मेदारी हर स्तर पर समान रूप से निभाई जानी चाहिए।


