लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड ने 15 परिवारों की दुनिया उजाड़ दी। यह केवल एक हादसा नहीं था, बल्कि उन लापरवाहियों का भयावह परिणाम था, जो वर्षों से नियमों की अनदेखी, अवैध निर्माण और प्रशासनिक उदासीनता के रूप में शहरों में पनपती रही हैं। अब एलडीए कोर्ट द्वारा संबंधित भवन को ध्वस्त करने का आदेश निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण और स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इमारत अवैध थी तो उसे बनने, संचालित होने और उसमें सैकड़ों लोगों की आवाजाही की अनुमति आखिर किसने दी?
न्यायालय ने भवन स्वामी को 15 दिन का समय दिया है कि वह स्वयं इमारत को गिरा दे, अन्यथा एलडीए ध्वस्तीकरण करेगा और पूरा खर्च भी उसी से वसूला जाएगा। यह आदेश केवल एक इमारत के विरुद्ध कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है जो नियमों को ताक पर रखकर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करते हैं।
लेकिन क्या केवल भवन मालिक ही इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार है? यदि कोई अवैध निर्माण वर्षों तक खड़ा रहता है, उसमें व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होती रहती हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन मिल जाते हैं, लोग पढ़ते और काम करते हैं, तो यह मान लेना कठिन है कि प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी। यदि जानकारी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि जानकारी नहीं थी, तो यह प्रशासनिक तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है।
हमारे शहरों में अवैध निर्माण अब अपवाद नहीं, बल्कि एक समानांतर व्यवस्था बन चुके हैं। नक्शा एक मंजिल का स्वीकृत होता है और भवन चार मंजिल का खड़ा हो जाता है। अग्निशमन विभाग की अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) के बिना संस्थान चलने लगते हैं। संकरी गलियों में बहुमंजिला इमारतें तैयार हो जाती हैं। जब तक कोई हादसा नहीं होता, तब तक सब कुछ सामान्य माना जाता है। हादसे के बाद जांच समितियां बनती हैं, नोटिस जारी होते हैं, अधिकारियों का तबादला होता है और कुछ समय बाद सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है।
अलीगंज अग्निकांड इस सोच को बदलने का अवसर भी है। यदि इस घटना के बाद केवल एक भवन गिरा दिया गया और बाकी अवैध निर्माण वैसे ही चलते रहे, तो यह कार्रवाई भी कुछ समय बाद केवल एक सरकारी रिकॉर्ड बनकर रह जाएगी। आवश्यकता इस बात की है कि पूरे शहर में ऐसे भवनों का व्यापक सर्वे कराया जाए, अग्नि सुरक्षा मानकों की नियमित जांच हो और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि न्याय केवल ध्वस्तीकरण तक सीमित न रहे। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस त्रासदी के वास्तविक जिम्मेदार लोगों को सजा मिलेगी? क्या उन अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होगी, जिनकी निगरानी में यह अवैध निर्माण वर्षों तक चलता रहा?
शहर केवल सड़कों, इमारतों और बाजारों से नहीं बनते, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा से बनते हैं। यदि नागरिक अपने बच्चों को कोचिंग, स्कूल, अस्पताल या कार्यालय भेजते समय यह भरोसा भी न कर सकें कि भवन सुरक्षित है, तो विकास के सभी दावे खोखले साबित होते हैं।
एलडीए कोर्ट का आदेश एक मजबूत शुरुआत है, लेकिन इसे अंतिम कार्रवाई नहीं, बल्कि व्यापक सुधार अभियान की पहली सीढ़ी माना जाना चाहिए। अब समय आ गया है कि प्रशासन, स्थानीय निकाय, अग्निशमन विभाग और भवन स्वामी सभी यह समझें कि नियम कागजों की औपचारिकता नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी की सुरक्षा का आधार हैं।
किसी भी शहर की असली पहचान उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि उन इमारतों में सुरक्षित लौटने वाले लोगों से होती है। उम्मीद है कि अलीगंज की यह त्रासदी भविष्य में किसी और परिवार की जिंदगी न उजाड़े और यह हादसा व्यवस्था को सचमुच जगाने का कारण बने, न कि कुछ दिनों की सुर्खियों तक सीमित रह जाए।


