लखनऊ में हुए दर्दनाक अग्निकांड ने एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को सामने ला दिया है, जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया जाता रहा। प्रदेश के शहरों और कस्बों में हजारों कोचिंग संस्थान ऐसे भवनों में संचालित हो रहे हैं जहां छात्रों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। कहीं बेसमेंट को कक्षाओं में बदल दिया गया, कहीं आपातकालीन निकास का कोई प्रबंध नहीं है, तो कहीं अग्निशमन उपकरण केवल कागजों में मौजूद हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर शुरू हुआ प्रदेशव्यापी निरीक्षण अभियान केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के समानांतर खड़ी हो चुकी अव्यवस्थित कोचिंग संस्कृति पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
प्रदेश के प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, मेरठ, आगरा और गोरखपुर सहित अनेक जिलों में चलाए गए अभियान में सौ से अधिक कोचिंग संस्थानों पर कार्रवाई होना इस बात का प्रमाण है कि समस्या कितनी व्यापक और गंभीर है। कानपुर के काकादेव जैसे देशभर में प्रसिद्ध कोचिंग हब में तीस से अधिक संस्थानों का सील होना यह दर्शाता है कि नियमों का उल्लंघन अपवाद नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुका था।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि कई संस्थानों ने पार्किंग के लिए स्वीकृत बेसमेंट को विद्यार्थियों के क्लासरूम में बदल दिया था। यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि हजारों छात्रों के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ है। यदि किसी आपात स्थिति में आग या अन्य दुर्घटना हो जाए तो ऐसे बंद और संकरे स्थान मौत के जाल में बदल सकते हैं। दिल्ली के राजेंद्र नगर कोचिंग हादसे से लेकर देश के कई अन्य शहरों में हुई घटनाएं इस खतरे की भयावहता पहले ही साबित कर चुकी हैं।
प्रयागराज में 97 पंजीकृत कोचिंग संस्थानों में केवल 15 के पास फायर एनओसी होना प्रशासनिक और संस्थागत दोनों स्तरों की विफलता को उजागर करता है। सवाल यह भी है कि जब इतने बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी हो रही थी तो संबंधित विभाग अब तक क्या कर रहे थे? क्या निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित थे? क्या सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता थी? इन प्रश्नों का उत्तर भी उतना ही आवश्यक है जितना दोषी संस्थानों पर कार्रवाई।
कोचिंग उद्योग आज हजारों करोड़ रुपये का कारोबार बन चुका है। प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने इसे शिक्षा के समानांतर एक विशाल व्यवस्था में बदल दिया है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकांश स्थानों पर भवन सुरक्षा, अग्निशमन मानक, पार्किंग व्यवस्था, भीड़ प्रबंधन और आपदा प्रबंधन जैसे मूलभूत नियमों की अनदेखी की जाती रही है। छात्रों और अभिभावकों का ध्यान केवल परिणामों पर केंद्रित रहता है, जबकि संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर बहुत कम सवाल उठाए जाते हैं।
सरकार का वर्तमान अभियान स्वागत योग्य है, लेकिन इसकी सफलता केवल सीलिंग और नोटिस तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि पूरे प्रदेश में कोचिंग संस्थानों के लिए एक पारदर्शी और कठोर नियामक ढांचा तैयार किया जाए। प्रत्येक संस्थान का वार्षिक सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य हो, फायर एनओसी और भवन मानचित्र की जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों पर आर्थिक दंड के साथ-साथ आपराधिक जिम्मेदारी भी तय की जाए।
यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अभियान कुछ दिनों की सुर्खियों तक सीमित न रह जाए। अक्सर हादसों के बाद कार्रवाई होती है, फिर समय बीतने के साथ व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। यदि इस बार प्रशासनिक सख्ती निरंतर बनी रही तो यह प्रदेश के लाखों छात्रों की सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम साबित हो सकती है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में सफलता नहीं, बल्कि सुरक्षित और सकारात्मक वातावरण में सीखने का अवसर देना भी है। यदि किसी कोचिंग संस्थान की इमारत ही छात्रों के लिए खतरा बन जाए, तो उसकी शैक्षणिक उपलब्धियां भी अर्थहीन हो जाती हैं। इसलिए समय की मांग है कि शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले संस्थानों में सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए और नियमों को केवल औपचारिकता नहीं बल्कि अनिवार्य जिम्मेदारी माना जाए।


