शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में कोचिंग संस्थानों के खिलाफ शुरू हुआ व्यापक निरीक्षण अभियान केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि वर्षों से उपेक्षित सुरक्षा मानकों और अनियंत्रित कोचिंग उद्योग पर सरकार की सबसे बड़ी कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। लखनऊ के अलीगंज में हुए दर्दनाक अग्निकांड के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशभर में कोचिंग संस्थानों, लाइब्रेरी केंद्रों और छात्र अध्ययन केंद्रों की जांच के निर्देश दिए, जिसके बाद प्रशासन, पुलिस, अग्निशमन विभाग, विकास प्राधिकरणों और विद्युत सुरक्षा विभाग की संयुक्त टीमें मैदान में उतर गईं।
प्रारंभिक जांच के आंकड़े ही स्थिति की गंभीरता को उजागर करने के लिए पर्याप्त हैं। प्रदेश के विभिन्न शहरों में 100 से अधिक कोचिंग संस्थानों पर कार्रवाई की जा चुकी है। कानपुर के काकादेव क्षेत्र में 30 से अधिक संस्थानों को सील किया गया। अयोध्या में 100 से अधिक संस्थान जांच के दायरे में आए, जहां केवल 36 संस्थानों के पास ही वैध फायर एनओसी मिली। प्रयागराज में 97 पंजीकृत कोचिंग संस्थानों में केवल 15 के पास फायर विभाग की एनओसी पाई गई। वाराणसी, मेरठ, आगरा, गोरखपुर, अलीगढ़ और लखनऊ में भी बड़ी संख्या में संस्थानों के विरुद्ध कार्रवाई हुई है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अनेक कोचिंग संस्थान ऐसे भवनों में संचालित पाए गए जिनका नक्शा कार्यालय, व्यावसायिक प्रतिष्ठान या अन्य उपयोग के लिए स्वीकृत था। कई जगहों पर बेसमेंट, जो पार्किंग के लिए स्वीकृत थे, उन्हें विद्यार्थियों के क्लासरूम में बदल दिया गया। कहीं आपातकालीन निकास नहीं था, कहीं अग्निशमन यंत्र निष्क्रिय मिले और कई भवनों में विद्युत सुरक्षा मानकों का भी पालन नहीं किया जा रहा था।
यह स्थिति केवल नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं है, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के जीवन से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े करती है। उत्तर प्रदेश में अनुमानित रूप से हजारों कोचिंग संस्थान संचालित हैं, जिनमें प्रतिदिन लाखों छात्र अध्ययन करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने कोचिंग उद्योग को हजारों करोड़ रुपये का कारोबार बना दिया है, लेकिन इसके समानांतर सुरक्षा और नियमन की व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी।
लखनऊ में एलन, ग्रैविटी और अन्य प्रमुख संस्थानों पर हुई कार्रवाई ने यह संदेश दिया है कि प्रशासन अब केवल छोटे संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा। यदि किसी प्रतिष्ठित ब्रांड या बड़े संस्थान में भी नियमों का उल्लंघन पाया जाएगा तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होगी। यही प्रशासनिक निष्पक्षता इस अभियान की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
हालांकि इस कार्रवाई के साथ कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़े हैं। पहला, यदि वर्षों से बिना फायर एनओसी, बिना मानचित्र स्वीकृति और सुरक्षा मानकों के विरुद्ध संस्थान संचालित हो रहे थे, तो संबंधित विभाग अब तक क्या कर रहे थे? दूसरा, क्या निरीक्षण और प्रमाणन की व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित थी? तीसरा, क्या उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी जिन्होंने नियमों के उल्लंघन के बावजूद संस्थानों को संचालित होने दिया?
अलीगंज अग्निकांड के बाद एलडीए के 18 अभियंताओं के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि केवल संस्थानों पर कार्रवाई होगी और विभागीय लापरवाही पर पर्दा डाल दिया जाएगा तो समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।
यह भी आवश्यक है कि सरकार कोचिंग संस्थानों के लिए एक समग्र नियामक ढांचा विकसित करे। प्रत्येक संस्थान के लिए वार्षिक सुरक्षा ऑडिट, अनिवार्य फायर एनओसी, भवन संरचना का सत्यापन, आपदा प्रबंधन योजना और विद्यार्थियों की संख्या के अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही सभी स्वीकृत संस्थानों की सूची सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि अभिभावक भी जानकारी के आधार पर निर्णय ले सकें।
उत्तर प्रदेश में चल रहा यह अभियान केवल सीलिंग और नोटिस तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि इसे दीर्घकालिक सुधार कार्यक्रम में बदला गया तो यह लाखों विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता स्थापित करने का ऐतिहासिक अवसर साबित हो सकता है।
शिक्षा का उद्देश्य भविष्य निर्माण है, लेकिन यदि शिक्षण संस्थान ही असुरक्षित हों तो यह उद्देश्य अधूरा रह जाता है। इसलिए यह समय केवल कार्रवाई का नहीं, बल्कि व्यवस्था में व्यापक सुधार का है। विद्यार्थियों की सुरक्षा किसी भी व्यावसायिक हित से बड़ी है और यही सिद्धांत भविष्य की नीतियों का आधार बनना चाहिए।


