
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वृक्षारोपण अभियान के दौरान प्रदेशवासियों से “एक पेड़ मां के नाम” लगाने की अपील की है। यह केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला संदेश है। ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन चुका है, उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में वृक्षारोपण का महत्व और भी बढ़ जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने विकास की नई इबारत लिखी है। एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग, औद्योगिक कॉरिडोर, डिफेंस कॉरिडोर और नई शहरी परियोजनाओं ने प्रदेश की तस्वीर बदली है। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और अनेक फोरलेन तथा सिक्सलेन सड़कों के निर्माण ने आर्थिक गतिविधियों को गति दी है। लेकिन विकास की इस दौड़ की एक कीमत भी चुकानी पड़ी है। हजारों नहीं बल्कि लाखों पेड़ सड़क निर्माण और अन्य परियोजनाओं की भेंट चढ़ गए।
पेड़ केवल लकड़ी का स्रोत नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति के संतुलन का आधार हैं। एक परिपक्व वृक्ष अपने जीवनकाल में हजारों लीटर पानी के संरक्षण, वायु शुद्धिकरण और तापमान नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब बड़ी संख्या में वृक्ष काटे जाते हैं तो उसका प्रभाव सीधे मौसम पर दिखाई देता है। यही कारण है कि आज उत्तर प्रदेश समेत पूरे उत्तर भारत में गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। मई और जून के महीने में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। लू की अवधि बढ़ रही है और वर्षा का चक्र भी अनिश्चित होता जा रहा है।
कभी गांवों और शहरों के आसपास आम, पीपल, बरगद, नीम और शीशम के विशाल वृक्ष प्राकृतिक छाया प्रदान करते थे। खेतों की मेड़ों पर हरियाली दिखाई देती थी। आज वही क्षेत्र कंक्रीट के जंगलों में बदलते जा रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि भूजल स्तर नीचे जा रहा है, पक्षियों की संख्या घट रही है और पर्यावरणीय असंतुलन लगातार बढ़ रहा है।
सरकार का दावा है कि प्रदेश में वन क्षेत्र बढ़ा है और करोड़ों पौधे लगाए गए हैं। यह स्वागत योग्य प्रयास है। लेकिन केवल पौधे लगाने से लक्ष्य पूरा नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती इन पौधों को जीवित रखना है। अक्सर वृक्षारोपण अभियान आंकड़ों तक सीमित रह जाते हैं। लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन कुछ वर्षों बाद उनका अस्तित्व नजर नहीं आता। इसलिए अब समय आ गया है कि वृक्षारोपण को सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन बनाया जाए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का “एक पेड़ मां के नाम” अभियान इसी दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। यदि प्रदेश का हर नागरिक अपनी मां के सम्मान में एक पौधा लगाए और उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित करे, तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश की पर्यावरणीय तस्वीर बदल सकती है। स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों, नगर निकायों और सामाजिक संगठनों को भी इस अभियान से जोड़ने की आवश्यकता है।
विकास आवश्यक है, लेकिन विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। जितने पेड़ विकास परियोजनाओं में कटें, उससे कहीं अधिक संख्या में नए वृक्ष लगाए और संरक्षित किए जाने चाहिए। यह केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आने वाली पीढ़ियों को केवल चौड़ी सड़कें और ऊंची इमारतें ही नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, हरियाली और संतुलित पर्यावरण भी सौंपें। यदि ऐसा नहीं हुआ तो विकास की चमक के पीछे छिपा पर्यावरण संकट आने वाले वर्षों में और भयावह रूप ले सकता है।
एक पेड़ मां के नाम लगाना केवल एक भावनात्मक अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति, भविष्य और मानव सभ्यता को बचाने का संकल्प है।


