शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी सत्ता परिवर्तन, सामाजिक समीकरण या चुनावी रणनीति की बात होती है, तब सबसे पहले जिस वर्ग का नाम सामने आता है वह है “पिछड़ा वर्ग”। यही वह सामाजिक शक्ति है जिसने पिछले तीन दशकों में प्रदेश की राजनीति का चेहरा बदला, सरकारें बनाईं और कई बड़े नेताओं को राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचाया। लेकिन अब वही पिछड़ा वर्ग एक बार फिर अपने राजनीतिक भविष्य और हिस्सेदारी को लेकर नए मंथन के दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है। “पिछड़ा वर्ग फ्रंट” के गठन की चर्चा इसी बदलते राजनीतिक वातावरण का संकेत है।
पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह यादव के नेतृत्व में इस नए मंच की संभावित शुरुआत को केवल एक संगठनात्मक गतिविधि मानना राजनीतिक भूल होगी। दरअसल यह उस सामाजिक बेचैनी की अभिव्यक्ति है, जो वर्षों से छोटे और गैर-प्रमुख पिछड़े वर्गों के भीतर पनप रही है। लंबे समय तक पिछड़ा राजनीति कुछ प्रभावशाली जातियों और नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही, जबकि बड़ी संख्या में अन्य पिछड़ी जातियां राजनीतिक रूप से स्वयं को हाशिये पर महसूस करती रहीं।
यही कारण है कि आज “सिर्फ वोट नहीं, हिस्सेदारी चाहिए” जैसी सोच तेजी से मजबूत हो रही है। यह केवल विधानसभा टिकट या मंत्री पद की लड़ाई नहीं है, बल्कि सामाजिक सम्मान, प्रशासनिक भागीदारी, आर्थिक अवसर और राजनीतिक पहचान की लड़ाई बन चुकी है।
उत्तर प्रदेश में ओबीसी आबादी को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन सामान्य रूप से माना जाता है कि प्रदेश की आधे से अधिक आबादी किसी न किसी रूप में पिछड़े वर्ग से जुड़ी है। 403 विधानसभा सीटों में करीब 250 सीटें ऐसी हैं जहां ओबीसी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि भाजपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और क्षेत्रीय दल सभी पिछड़ा वर्ग को अपने राजनीतिक केंद्र में रखने को मजबूर हैं।
भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में गैर-यादव पिछड़े वर्गों पर विशेष फोकस कर अपनी सामाजिक पकड़ मजबूत की। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक समीकरण के जरिए नई सामाजिक गोलबंदी की कोशिश की। लेकिन इन सबके बीच यह सवाल लगातार बना रहा कि क्या पिछड़ा समाज वास्तव में एकजुट राजनीतिक शक्ति बन पाया है, या केवल चुनावी गणित का हिस्सा भर बनकर रह गया है?
यहीं से पिछड़ा वर्ग फ्रंट जैसी अवधारणा जन्म लेती है। यह मंच यदि केवल जातीय सम्मेलन और राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है तो उसका प्रभाव सीमित रहेगा। लेकिन यदि यह शिक्षा, रोजगार, स्थानीय नेतृत्व, पंचायत से संसद तक प्रतिनिधित्व, आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर ठोस कार्यक्रम तैयार करता है, तो आने वाले वर्षों में यह यूपी की राजनीति का बड़ा फैक्टर बन सकता है।
इस पूरी प्रक्रिया में दिलचस्प बात यह भी है कि भाजपा के भीतर से आने वाले कुछ युवा और संगठनात्मक चेहरे भी इस पहल को सकारात्मक बता रहे हैं। युवा नेता प्रभाकर राजपूत और पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष रुपेश गुप्ता जैसे नेताओं के बयान यह संकेत देते हैं कि पिछड़ा वर्ग की राजनीति अब केवल एक दल तक सीमित नहीं रही। यह एक व्यापक सामाजिक विमर्श का रूप लेती जा रही है।
रुपेश गुप्ता जैसे नेताओं का उभरना भी इसी बदलाव का संकेत है। संगठनात्मक राजनीति से निकले, लंबे समय तक जिलाध्यक्ष रहने वाले और गैर-विवादित छवि रखने वाले नेताओं को अब सामाजिक प्रतिनिधित्व के नए चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा भी पिछले कुछ वर्षों में ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम करती दिखाई दी है, जिनकी पकड़ जातीय समीकरण के साथ-साथ संगठन और कार्यकर्ताओं पर भी मजबूत हो।
हालांकि सबसे बड़ी चुनौती अभी भी “एकता” ही है। पिछड़ा वर्ग स्वयं दर्जनों जातीय समूहों में बंटा हुआ है और हर समूह की अपनी स्थानीय राजनीति, नेतृत्व और प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में एक साझा मंच तैयार करना आसान नहीं होगा। यदि नेतृत्व केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा तक सीमित रहा, तो यह प्रयास भी कई पुराने प्रयोगों की तरह बिखर सकता है।
लेकिन यदि यह मंच सामाजिक आंदोलन की तरह गांवों, युवाओं, छात्रों और छोटे व्यापारियों तक पहुंच बनाने में सफल हुआ, तो आने वाले पंचायत, निकाय और विधानसभा चुनावों में इसका असर साफ दिखाई दे सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक न्याय की अगली लड़ाई शायद अब नए रूप में शुरू हो चुकी है।
फिलहाल इतना तय है कि “पिछड़ा वर्ग फ्रंट” की चर्चा केवल एक संगठन के गठन की खबर नहीं, बल्कि यूपी की राजनीति में बदलते सामाजिक संतुलन और नई राजनीतिक चेतना की दस्तक है।


