लखनऊ
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) की कार्यपरिषद में अब तक दलित और पिछड़े वर्ग के प्रोफेसरों को शामिल न किए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस मुद्दे पर राजभवन उत्तर प्रदेश ने गंभीर रुख अपनाते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र भेजकर जल्द कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
दरअसल, प्रदेश सरकार ने 2 जनवरी 2026 को केजीएमयू की नियमावली में संशोधन करते हुए “किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश (संशोधन) अधिनियम 2025” लागू किया था। इसके तहत अधिनियम की धारा 24(1) में यह स्पष्ट प्रावधान किया गया कि कार्यपरिषद में अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के वरिष्ठतम आचार्य को शामिल किया जाए। इसके बावजूद अब तक इस नियम का पालन नहीं किया गया।
इस मामले को लेकर कई स्तरों पर आपत्तियां उठीं। विधायक जय देवी ने राज्यपाल को पत्र लिखकर इस मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया। वहीं कार्यपरिषद सदस्य डॉ. सुरेश अहिरवार ने भी ज्ञापन भेजकर नियमों के अनुपालन की मांग की। लगातार मिल रही शिकायतों के बाद राजभवन ने पूरे मामले को संज्ञान में लिया।
राज्यपाल के विशेष कार्याधिकारी डॉ. पंकज कुमार एल जानी ने 24 अप्रैल को कुलपति को भेजे पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि दलित और पिछड़े वर्ग के प्रोफेसरों को कार्यपरिषद में शामिल करने की प्रक्रिया तत्काल पूरी की जाए। पत्र में विभिन्न शिकायतों और ज्ञापनों का भी उल्लेख किया गया है।
इस संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि प्रक्रिया जारी है और जल्द ही मनोनयन कर लिया जाएगा। हालांकि, मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और नियमों के पालन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब आने वाले दिनों में सामने आ सकता है।


