शरद कटियार
देश में ऐसे बहुत कम स्थल हैं, जिनसे करोड़ों लोगों की भावनाएं और आस्था इतनी गहराई से जुड़ी हों। ऐसे किसी भी धार्मिक संस्थान में चढ़ावे या दान से जुड़ी अनियमितताओं के आरोप केवल आर्थिक अपराध नहीं माने जाते, बल्कि वे श्रद्धालुओं के विश्वास पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में जांच जितनी निष्पक्ष होगी, उतना ही जनता का भरोसा मजबूत होगा।
हाल के घटनाक्रम में चढ़ावे में कथित हेराफेरी के मामले में एफआईआर दर्ज हुई, कई लोगों की गिरफ्तारी हुई और जांच आगे बढ़ रही है। यह कानून के अनुसार आवश्यक प्रक्रिया है। लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि यदि लंबे समय तक किसी व्यवस्था में गड़बड़ी चलती रही, तो निगरानी तंत्र ने उसे समय रहते क्यों नहीं पकड़ा? क्या आंतरिक ऑडिट, सीसीटीवी निगरानी, वित्तीय सत्यापन और प्रशासनिक नियंत्रण पर्याप्त थे? यदि थे, तो चूक कहां हुई? और यदि नहीं थे, तो उनकी जिम्मेदारी किसकी है?
देश के बड़े धार्मिक संस्थानों में प्रतिदिन करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। ऐसे में पारदर्शिता केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। श्रद्धालु यह जानना चाहते हैं कि उनके द्वारा अर्पित धन और बहुमूल्य वस्तुओं का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है। नियमित ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्ड, स्वतंत्र वित्तीय परीक्षण और समय-समय पर सार्वजनिक रिपोर्ट व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बना सकते हैं।
इस प्रकरण का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी व्यक्ति या संस्था को दोषी मान लेना न्यायसंगत नहीं होगा। कानून का मूल सिद्धांत है कि आरोप और दोष सिद्ध होने में अंतर होता है। इसलिए जांच एजेंसियों को बिना किसी दबाव या पूर्वाग्रह के सभी तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल करनी चाहिए। यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही, अनियमितता या भ्रष्टाचार सामने आता है, तो संबंधित सभी जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए।
यह मामला किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का है। इसलिए इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करने के बजाय संस्थागत सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था विकसित होनी चाहिए, जहां किसी भी धार्मिक ट्रस्ट में वित्तीय पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी के स्पष्ट एवं कठोर मानक लागू हों।
जनता की अपेक्षा केवल इतनी है कि सत्य सामने आए। यदि कोई निर्दोष है तो उसे संदेह से मुक्ति मिले और यदि कोई दोषी है तो उसे कानून के अनुसार दंड मिले। आस्था तभी सुरक्षित रहती है, जब उसके साथ पारदर्शिता, ईमानदारी और जवाबदेही भी जुड़ी हो। यही किसी भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी है।


