फर्रुखाबाद । उत्तर प्रदेश की राजनीति में अन्य पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी और आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सामाजिक न्याय की राजनीति को लेकर चंद्रपाल वर्मा ने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की पूर्ववर्ती सरकारों पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि यदि इन दलों ने सत्ता में रहते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी के अनुपात में 60 प्रतिशत आरक्षण दिलाने की दिशा में ठोस पहल की होती, तो प्रदेश की राजनीति का स्वरूप आज अलग होता और संभव है कि सपा-बसपा की सरकारें लगातार बनती रहतीं।
वर्मा का कहना है कि उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल से जुड़ा रहा है। आबादी में बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद सरकारी नौकरियों, शिक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उनकी हिस्सेदारी को लेकर लगातार बहस होती रही है। ऐसे में सत्ता में आने वाली पार्टियों से अपेक्षा रहती है कि वे पिछड़े वर्ग के हितों को केवल चुनावी मुद्दा न बनाएं, बल्कि उनके लिए ठोस नीतिगत फैसले भी करें।
ओबीसी आरक्षण की बहस केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं है। इसके साथ शिक्षा, प्रशासन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता के संस्थानों में भागीदारी का सवाल भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि पिछड़े वर्ग के बीच आरक्षण को लेकर होने वाली हर राजनीतिक घोषणा को गंभीरता से देखा जाता है।
चंद्रपाल वर्मा के बयान का राजनीतिक संकेत भी साफ है। उनका मानना है कि सपा और बसपा ने पिछड़े और वंचित तबकों की राजनीति के आधार पर मजबूत जनाधार तैयार किया, लेकिन सत्ता में रहते हुए यदि आबादी के अनुपात में आरक्षण की निर्णायक लड़ाई लड़ी जाती, तो इन दलों का सामाजिक आधार और अधिक मजबूत हो सकता था।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। मंडल राजनीति के बाद पिछड़ा वर्ग प्रदेश की चुनावी राजनीति की प्रमुख ताकत बनकर उभरा। समाजवादी पार्टी ने पिछड़ों, विशेषकर यादव और अन्य सामाजिक समूहों के बीच अपना आधार बनाया, जबकि बहुजन समाज पार्टी ने दलितों के साथ अन्य सामाजिक वर्गों को जोड़कर व्यापक राजनीतिक गठजोड़ खड़ा करने की कोशिश की।
लेकिन समय के साथ सामाजिक समीकरण बदले। नए राजनीतिक गठबंधनों ने पिछड़े वर्ग के अलग-अलग समूहों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई। ऐसे में पिछड़े वर्ग के भीतर यह सवाल लगातार उठता रहा है कि उनकी आबादी के अनुपात में सत्ता और संसाधनों में वास्तविक हिस्सेदारी कितनी है।
आबादी के अनुपात में 60 प्रतिशत आरक्षण की मांग सामान्य राजनीतिक घोषणा नहीं है। यह आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था, संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक सीमाओं से जुड़ा व्यापक प्रश्न है। इसलिए ऐसी मांग को लागू करने के लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि संवैधानिक और कानूनी स्तर पर भी ठोस रास्ता तैयार करना होगा।
फिर भी इस मांग का राजनीतिक महत्व कम नहीं है। इसका सीधा संदेश यह है कि पिछड़ा वर्ग अब केवल आरक्षण की घोषणा नहीं, बल्कि आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी की राजनीति की ओर देख रहा है।
चंद्रपाल वर्मा का बयान सपा और बसपा के लिए एक राजनीतिक आत्ममंथन का सवाल खड़ा करता है। जिन सामाजिक वर्गों के समर्थन ने इन दलों को सत्ता तक पहुंचाया, क्या सत्ता में रहते हुए उनके लिए उतनी ही निर्णायक नीतियां बनाई गईं, जितनी उनसे अपेक्षा थी?
यह सवाल केवल सपा या बसपा तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश की हर राजनीतिक पार्टी के सामने यह चुनौती है कि वह पिछड़े वर्ग की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शिक्षा, रोजगार और प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर अपना स्पष्ट रोडमैप सामने रखे।
आखिरकार लोकतंत्र में संख्या केवल चुनाव जीतने का आधार नहीं होनी चाहिए। यदि कोई वर्ग आबादी का बड़ा हिस्सा है तो उसके लिए शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और सत्ता में सम्मानजनक भागीदारी भी लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा होनी चाहिए।
ओबीसी को आबादी के हिसाब से 60 फीसदी आरक्षण मिलता तो सपा-बसपा की सरकारें बनती रहतीं


