शरद कटियार
उत्तर प्रदेश लंबे समय तक गोवंश संरक्षण की बहसों में केवल भावनात्मक और राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना रहा। सड़कों पर घूमता छुट्टा पशु, किसानों की फसलों को नुकसान और गौशालाओं की बदहाली जैसे मुद्दे अक्सर सरकारों के सामने चुनौती बनकर खड़े रहे। लेकिन अब वही उत्तर प्रदेश देशी गायों के सहारे एक नई आर्थिक क्रांति का मॉडल दुनिया के सामने रख रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से विकसित “गो-इकोनॉमी” मॉडल यह साबित कर रहा है कि यदि नीति, तकनीक और प्रबंधन एक साथ आएं तो गो संरक्षण केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ भी बन सकता है।
गाजियाबाद के सिकंदरपुर से शुरू हुआ “हेता” मॉडल इसकी सबसे बड़ी मिसाल बनकर उभरा है। कभी अमेरिका और दुनिया की बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों में इंजीनियर रहे असीम रावत ने कॉरपोरेट करियर छोड़कर जिस मिशन की शुरुआत की, वह आज हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है। एक हजार से अधिक देशी गायों पर आधारित यह एथिकल डेयरी सिस्टम आज सालाना लगभग 10 करोड़ रुपये के कारोबार तक पहुंच चुका है। खास बात यह है कि यह मॉडल केवल दूध बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि देशी गायों से जुड़े हर उत्पाद को मूल्य आधारित बाजार से जोड़ रहा है।
आज वैश्विक बाजार में A2 दूध, बिलौना घी, ब्राह्मी घृत, शतधौत घृत, हर्बल चाय, ऑर्गेनिक फूड, पंचगव्य उत्पाद और स्किन-हेयर केयर सामग्री की मांग तेजी से बढ़ रही है। पश्चिमी देशों में प्राकृतिक और रसायन मुक्त उत्पादों की बढ़ती चाहत ने भारतीय देशी नस्लों को नई पहचान दी है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में तैयार हो रहे उत्पाद अब अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, सिंगापुर और दुबई जैसे देशों तक पहुंच रहे हैं। यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान की वैश्विक स्वीकार्यता का संकेत भी है।
इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत इसका मानवीय दृष्टिकोण है। यहां बूढ़ी और दूध न देने वाली गायों को बोझ नहीं माना जाता। उन्हें संरक्षण की प्रक्रिया का हिस्सा बनाकर रखा जाता है। यही अंतर इसे पारंपरिक डेयरी मॉडल से अलग बनाता है। आमतौर पर डेयरी व्यवसाय लाभ कम होने पर पशुओं को छोड़ देता है, लेकिन इस व्यवस्था में गोवंश को आर्थिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से उपयोगी बनाने का प्रयास किया गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस मॉडल से संरक्षित साहीवाल गाय की आरती और गोपूजन करना भी इस पहल की राष्ट्रीय स्वीकार्यता को दर्शाता है। यह संदेश स्पष्ट है कि भारत की स्वदेशी नस्लें केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की जैविक अर्थव्यवस्था की आधारशिला बन सकती हैं।
योगी सरकार ने भी इस दिशा में योजनाओं का बड़ा ढांचा तैयार किया है। ऑपरेशन-4 और डेयरी मास्टर प्लान जैसी योजनाओं के माध्यम से पशुपालकों को 50 प्रतिशत तक सब्सिडी, बैंक ऋण और अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है। साहीवाल, गिर, गंगातीरी और सिंधी जैसी देशी नस्लों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इससे गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं और किसान खेती के साथ डेयरी आधारित आय की ओर बढ़ रहे हैं।
हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। गो आधारित अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण, अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन, वैज्ञानिक रिसर्च और मार्केटिंग नेटवर्क को और मजबूत करना होगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में छोटे पशुपालकों तक पहुंचे, केवल बड़े संस्थानों तक सीमित न रह जाए।
इसके बावजूद यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश ने गो संरक्षण को केवल राजनीतिक नारे से आगे बढ़ाकर आर्थिक मॉडल में बदलने की दिशा में बड़ा प्रयोग किया है। यदि यह मॉडल इसी तरह विस्तार पाता रहा तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश न केवल भारत, बल्कि दुनिया के डेयरी और ऑर्गेनिक बाजार में नई पहचान बना सकता है। यह “गो सेवा” से आगे बढ़कर “गो समृद्धि” की नई कहानी है, जिसकी गूंज अब वैश्विक मंचों तक सुनाई देने लगी है।


